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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 778 में से

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पृष्ठ 485

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७५
—इत्यादि मन्त्रोंमें योनिका अर्थ मूत्रेन्द्रिय ही है,
यह कहना अज्ञता ही है। श्रीविष्णु आदि देवाधिदेवोंका
भी पूज्य यह योनिप्रतिष्ठित लिंग प्राकृत वस्तु कथमपि
नहीं हो सकता। यदि विष्णुकर्तृक पूजा आदिको
क्षेपक कहें, तब तो समस्त कथाको ही क्षेपक मान
सकते हैं।
अव्यक्तका लिंग (व्यक्त ब्रह्माण्ड) भृगु
(प्रकृति)-के आकर्षण-विकर्षणविशेषके तारतम्यसे
द्यावापृथिवीरूपमें दो टूक हो गया—
'वायुरापश्चन्द्रमा इत्येते भृगवः।'
(गोपथब्राह्मण पूर्व २।८)
शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धम्
शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य॥
श्रीशंकरने भी विश्वेश्वरलिंगकी प्रतिष्ठापना
और पूजा की है—
ब्रह्मणा विष्णुना वापि रुद्रेणान्येन केन वा।
लिङ्गप्रतिष्ठामुत्सृज्य क्रियते स्वपदस्थितिः॥
किमन्यदिह वक्तव्यं प्रतिष्ठां प्रति कारणम्।
प्रतिष्ठितं शिवेनापि लिङ्गं वैश्वेश्वरं यतः॥
'नारदपांचरात्र' के तीसरे रात्रमें, जो कि वैष्णवोंका
सर्वस्व है, लिखा है कि एक शंकरके सिवा सभी
स्त्रैण थे। ब्रह्मा, विष्णु, दक्ष आदिने तपस्यासे कालिका
देवीको प्रकट किया। देवीने कहा—'वर माँगो।'
देवोंने कहा कि 'आप दक्ष-कन्या होकर शिवको
मोहित करो।' जगदीश्वरीने कहा—'शम्भु तो बालक
है।' ब्रह्माने कहा—'शम्भुके समान दूसरा कोई पुरुष
हो नहीं सकता।' यह सुनकर दक्षके यहाँ देवी
सतीरूपसे प्रकट हुईं। देवताओंने विवाह कराया।
सती-शिवके रमणसे दोनोंका तेज भूमण्डलमें पड़ा,
वही पाताल, भूतल, स्वर्ग सर्वत्र योनिसहित शिवलिंग
हुए। लिंगपूजा शाक्त, वैष्णव, सौर, गाणपत्य सभीके
लिये है—
शाक्तो वा वैष्णवो वापि सौरो वा गाणपोऽथवा।
शिवार्चनविहीनस्य कुतः सिद्धिर्भवेत् प्रिये॥
(उत्पत्तितन्त्र)
शिवकी पूजाके बिना अन्य देवताकी पूजा
करनेसे वह देव शाप देकर चला जाता है—
'अनाराध्य च मां देवि योऽर्चयेद्देवतान्तरम्।
न गृह्णाति महादेवि शापं दत्त्वा व्रजेत् पुरम्॥'
यद्यपि शुद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक विवेचनोंसे
शिवलिंग अनादि ही है, उसकी पूजा भी अनादि ही
है तथापि अर्थवादरूपमें अनेक प्रकारसे शिवलिंगकी
उत्पत्ति और पूजाका आरम्भ लिखा गया है। जैसे
यद्यपि नित्यसिद्ध ही राम, कृष्णका अवतार माना
जाता है तथापि अवतारसे पहले भी वे पूज्य थे ही,
क्योंकि कल्प-कल्पमें उनके अवतार होते रहते हैं,
कोई अवतार नया नहीं है। वैसी ही बात शिवलिंगके
विषयमें भी समझनी चाहिये। नित्य होनेपर भी
भिन्न-भिन्न कल्पमें उसके आविर्भावके क्रम भिन्न
हैं। समष्टि प्रजननशक्तिसम्पन्न शिवतत्त्व ही समष्टि
लिंग है। उसीसे समस्त व्यष्टि योनि और लिंगोंका
आविर्भाव हुआ है। यही सती-शिवके मैथुनसे प्रादुर्भूत
तेजसे सयोनि लिंगोंकी उत्पत्तिका रहस्य है। प्रकृति-
पुरुषका संयोग ही शिव-सतीका मैथुन है। प्रकृति-
मिश्रित अनन्त पुरुषोंका प्रादुर्भाव ही उनका मिश्रित
तेज है। समष्टि लिंगसे ही उत्पन्न होकर व्यष्टि लिंग
बनते हैं। अतः सभी व्यष्टि लिंगोंकी योनि भी समष्टि
लिंगकी ही योनि है। यही शिवके दारुका वन-
विहारका रहस्य है।
अनन्त अनंग (कामदेव) जिनके श्रीअंगके
सौन्दर्य-बिन्दुपर मोहित हो जाते हैं, उन भगवान् परम
शिवकी ओर समष्टि-व्यष्टि प्रकृतिरूप योनियोंका
आकर्षण होना स्वाभाविक ही है। यही मुनिपत्नियोंका
शिवकी ओर आसक्त होनेका रहस्य है।
मुनियों या शुक्राचार्यके शापसे भगवान्‌का
योनिस्य लिंगरूपसे पूजित होना या शिवके लिंगका
गिर जाना, पुनः उससे जगतताप होना, शिवाका योनिमें
स्थापन करना, ब्रह्मा-विष्णु आदि देवताओं और
ऋषि-मुनि-गन्धर्व-असुरादिद्वारा पूजित होना—यह
सभी स्वतन्त्रेच्छ, निरंकुश भगवान्‌की लीला है, जैसे