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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 778 में से

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पृष्ठ 475

शिवसे शिक्षा ४६५

साथ ही उस विषको हृदयमें रखना भी बुरा है। अमृत-
पानके लिये सभी उत्सुक होते हैं, परंतु विषपानके लिये
शिव ही हैं; वैसे ही फलभोगके लिये सभी तैयार रहते
हैं, परंतु त्याग तथा परिश्रमको स्वीकारनेके लिये महापुरुष
ही प्रस्तुत होते हैं। जैसे अमृतपानके अनुचित लोभसे
देव-दानवोंका विद्वेष स्थिर हो गया, वैसे ही अनुचित
फलकामनासे समाजमें विद्वेष स्थिर हो जाता है।
शिवकुटुम्बका वैचित्र्य
शिवजीका कुटुम्ब भी विचित्र ही है। अन्नपूर्णाका
भण्डार सदा भरा, पर भोलेबाबा सदाके भिखारी। कार्तिकेय
सदा युद्धके लिये उद्यत, पर गणपति स्वभावसे ही
शान्तिप्रिय। फिर कार्तिकेयका वाहन मयूर, गणपतिका
मूषक, पार्वतीका सिंह और स्वयं अपना नन्दी और
उसपर आभूषण सर्पोंके। सभी एक-दूसरेके शत्रु, पर
गृहपतिकी छत्रछायामें सभी सुख तथा शान्तिसे रहते
हैं। घर में प्रायः विचित्र स्वभाव और रुचिके लोग रहते
हैं, जिसके कारण आपसमें खटपट चलती ही रहती है।
घरकी शान्तिके आदर्शकी शिक्षा भी शिवसे ही मिलती
है। भगवान् शिव और अन्नपूर्णा अपने-आप परम
विरक्त रहकर संसारका सब ऐश्वर्य श्रीविष्णु और
लक्ष्मीको अर्पण कर देते हैं। श्रीलक्ष्मी और विष्णु भी
संसारके सभी कार्योंको सँभालने, सुधारनेके लिये अपने
आप ही अवतीर्ण होते हैं। गौरी-शंकरको कुछ भी
परिश्रम न देकर आत्मानुसन्धानके लिये उन्हें निष्प्रपंच
रहने देते हैं। ऐसे ही कुटुम्ब और समाजके सर्वमान्य
पुरुषोंको चाहिये कि योग्यतम कुटुम्बियोंके हाथ समाज
और कुटुम्बका सब ऐश्वर्य दे दें और उन योग्य
अधिकारियोंको चाहिये कि समाजके प्रत्येक कार्य-
सम्पादनके लिये स्वयं ही अग्रसर हों, वृद्धोंको निष्प्रपंच
होकर आत्मानुसन्धान करने दें।
महापार्थिवेश्वर हिमालयकी महाशक्तिरूपा पुत्रीका
श्रीशिवके साथ परिणय होनेसे ही विश्वका कल्याण हो
सकता है। किसी प्रकारकी भी शक्ति क्यों न हो, जब-
तक वह धर्मसे परिणीत—संयुक्त नहीं होती, तबतक
कल्याणकारिणी नहीं होती। परंतु आसुरी शक्ति तो
तपस्या चाहती ही नहीं, फिर उसे शिव या धर्म कैसे
मिलेंगे? धर्मसम्बन्धके बिना शक्ति आसुरी होकर अवश्य ही
संहारका हेतु बनेगी। प्रकृतिमाताकी यह प्रतिज्ञा है कि—
यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥
(श्रीदुर्गासप्तशती ५।१२०)
अर्थात् संघर्षमें जो मुझे जीत लेगा, जो मेरे दर्पको
चूर्ण कर देगा और जो मेरे समान या अधिक बलका
होगा, वही मेरा पति होगा। यह स्पष्ट है कि रक्तबीज,
शुम्भ, निशुम्भ आदि कोई भी दैत्य, दानव प्रकृति-
विजेता नहीं हुए। किंतु सब प्रकृतिसे पराजित, प्रकृतिके
अंश काम, क्रोध, लोभ, मोह, दर्प आदिसे पद-पदपर
भग्नमनोरथ होते रहे हैं। हाँ, गुणातीत प्रकृतिपार भगवान्
शिव ही प्रकृतिको जीतते हैं। तभी तो प्रकृतिमाताने
उन्हें ही अपना पति बनाया। यही क्यों, कन्दर्प-विजयी
शिवकी प्राप्तिके लिये तो उन्होंने घोर तपस्या भी की।
आजका संसार शुम्भ-निशुम्भकी तरह विपरीत
मार्गसे प्रकृतिपर विजय चाहता है। इसीलिये प्रकृति
अनेक तरहसे उसका संहार कर रही है। पार्थिव, आप्य,
तैजस, विविध तत्त्वोंका अन्वेषण; जल, स्थल, नभपर
शासन करना; समुद्र-तलके जन्तुओंतककी शान्ति भंग
करना, तरह-तरहके यन्त्रोंका आविष्कार और उनसे
काम लेना ही आजका प्रकृतिजय है। इन्द्रिय, मन, बुद्धि
और उनके विकारोंपर नियन्त्रण करनेका आज कोई भी
मूल्य नहीं। प्रकृति भी कोयला, लोहा, तेल आदि
साधारण-से-साधारण वस्तुओंको निमित्त बनाकर उन्हीं
यन्त्रोंसे उनका संहार करा रही है।
आज शिव 'अनार्य' देवता बतलाये जा रहे हैं।
शिवकी आराधना भूल जानेसे आज राष्ट्रका भी शिव
(मंगल) नहीं हो रहा है—
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस ॥
(रा०च०मा० ४।१ सो०)