सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 418

' or 'वेा'?
Look at line 46:
'स्पर्शोत्स' then 'वेात्' or 'वोत्'?
Wait, 'त्' is there! "ोत्" -> उत्!
स्पर्श-उत्सव-उत्पुलकित:
स्पर्श + उत्सव = स्पर्शोत्सव.
स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित = स्पर्शोत्सवोत्पुलकित!
So it IS स्पर्शोत्सवोत्पुलकिता!
Wait, but why is there a 'त्'?
If it's स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित, then:
त्सव + उत् = त्सवोत् !
त् - स - व - ो - त् - प - ु = त्सवोत्पु !
YES! त्स-वो-त्-पु-ल-कि-ता !
WOW! That explains EVERYTHING!
It is NOT 'वात्'! It is 'वोत्'!
Because:
उत्सव + उत्-पुलकित = उत्सवोत्पुलकित!
And how is 'वोत्' spelled in this typeface?
Wait, let's look at 'वोत्':
Is it 'वोत्' or 'वेात्'?
Look at the glyph: there is 'व', an 'े' on top of 'व', an 'ा', and a 'त्' attached to 'पु'!
Wait, why is there an 'े' on 'व' and an 'ा' after 'व'? That is the way SOME typesetters accidentally typeset 'ो' (as 'े' +