भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ भक्तिसुधा
किन्हीं महापुरुषके पंचविध क्लेश—अविद्या,
अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश क्षीण हो चुके थे,
शान्त होकर पंचकोशातीतमें उनका मन लग गया।
तत्त्वसाक्षात्कार उन्हें हो चुका था, उन्हें कहीं
श्यामसुन्दरके दर्शन हो गये। अब प्रयत्न करते हैं, पर
समाधि ही नहीं लगती। किसीने कहा है कि 'जौ लों
तोहि नन्दको कुमार नाहीं दीठि परौ, तौ लौ
ध्यान धारणा समाधि तू करि ले।' उसका दर्शन
हो जानेके बाद चित्त खिंच जाता है, पर पवित्र
अन्तःकरणवालोंका ही वहाँ खिंचाव होता है। जैसे
चुम्बक स्वच्छ लोहेको जल्दी खींच लेता है, वैसे ही
वह श्यामसुन्दर महात्माओंके चित्तको जल्दी खींच
लेता है। उन्हें ज्ञात ही नहीं होता कि वे श्यामसुन्दरसे
क्यों इतना प्रेम करते हैं? यह श्रीभगवान्में विराजमान
चित्ताकर्षकत्व गुणका माहात्म्य है। यह तो हुई
योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी बात, पर यहाँ इन गँवारी ग्वालिनियोंने
तो इन योगीन्द्र-मुनीन्द्र मनोहारी श्रीभगवान्के भी
मनको खींच लिया। उन्हें श्रीभगवान् होकर भी इन
गोपरामाओंके साथ रमण करनेकी इच्छा हो गयी।
भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥
(श्रीमद्भा० १०।२९।१)
यह तो मानना ही पड़ेगा कि सनकादि, शुकादि
अन्य आत्मारामोंकी अपेक्षा श्रीभगवान्में अधिक
आत्मारामत्व था, पर इन्हें कम आत्मारामत्ववाली अथवा
जो आत्मारामत्वको जानतीं भी नहीं, उन गोपांगनाओंने
इनके आत्मारामत्वको छीन लिया और इन्हें 'गोपीराम'
या गोपीरमण बना दिया। निष्कामको सकाम बना दिया।
पूर्णकामता आदि छिप गयी, मन गोपरामाओंमें खिंच
गया। अब यह दशा हो रही है कि इनके पीछे-पीछे
घूम रहे हैं। इस प्रकार 'आकृष्टचित्ता रमापतेः' के
अर्थमें षष्ठी है। अतः यह अर्थ भी होता है कि श्रीरमापतिने
राजहंस, गजराज और सिंहकी गतिको लज्जित करनेवाली
गति, अनुराग, हास, अलसवलितादि विभ्रम तथा
मनोरमालापसे व्रजांगनाओंके चित्तको खींच लिया; क्योंकि
उन्होंने सोचा कि 'यदि चित्त इनके पास रहेगा तो ये
हमारे विप्रयोगजन्य तीव्रतापमें सन्तप्त होंगी।'
व्रजांगनाओंको 'प्रमदा' कहा गया। 'प्रकृष्टो मदो
यासाम्' इस व्युत्पत्तिसे भाव यह कि दैहिक सब प्रपंच
भूल गयीं, जिस मनके रहनेमें सन्ताप, वियोग होता है,
उसे तो भगवान्ने पहले ही हर लिया। अब सुख-दुःख
ही किसे हो? फिर श्रीभगवान्ने गोपांगनाओंमें प्रमद—
मादक मद उत्पन्न किया, जिससे वियोगतापमें भी उन्हें
संयोग प्रतीत हुआ, इससे वह वियोगजन्य तीव्रताप
उनके अन्तरमें प्रविष्ट न हो सका। इतनेपर भी यदि
श्रीमन्मोहनका विप्रयोग उन्हें बाधा पहुँचाये—तो ठीक
नहीं। अतः 'तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥'
(श्रीमद्भा० १०।३०।२) तदात्मिकाका अर्थ है—
'स एव रक्षकत्वेन वर्तमानो