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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

विज्ञप्ति
श्रील रूपगोस्वामी अपने ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए कहते हैं
कि ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ साधारण मनुष्यों के लिये समझने को अति दुरूह
है। परन्तु उनकी अभिकांक्षा है कि सनातनस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण उनकी
इस रचना से सन्तुष्ट हों।
श्रील रूपगोस्वामी ने ‘श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु’ को गोकुल
वृन्दावन में अनुमानतः १५५२ में समाप्त किया। संसार में अवस्थिति
के काल में श्रील रूपगोस्वामी वृन्दावन के नाना भागों में रहा करते थे
और उनका मुख्यालय वृन्दावन धाम के राधादामोदर मन्दिर में था।
श्रील रूपगोस्वामी की भजनस्थली आज भी विद्यमान है। राधादामोदर
में दो अलग-अलग स्तूप हैं। उनमें से एक को उनकी भजनकुटि कहा जाता
है और दूसरी में उनकी समाधि है। इस समाधि के ठीक पीछे मेरी अपनी
भजनस्थली है। परन्तु १६६५ से मैं वहाँ नहीं हूँ। अब मेरे शिष्य उस
स्थान की देखभाल कर रहे हैं। श्रीकृष्ण की इच्छा से अब मैं अन्तर्राष्ट्रीय
कृष्णभावनामृत संघ के लॉस एंजिल्स मन्दिर में निवास कर रहा हूँ। यह
तात्पर्यप्रकाश आज ३० जून, १६६६ को समाप्त हुआ।
इति भक्तिरसामृतसिन्धौ गौणभक्तिरसादिनिरूपणनामा उत्तर विभागः॥
इति भक्तिवेदान्त भाष्ये उत्तर विभागः ॥४॥
॥इति श्रीभक्तिरसामृत सिन्धुः॥

भूमिका
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
[अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ]
॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥
॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥
॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥

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भक्तिरसामृतसिन्धु की रचना श्रील रूप गोस्वामीने आज से प्रायः ५००
वर्ष पहले की थी। इस ग्रन्थ में उस विज्ञान का पूरा वर्णन है जिसके द्वारा
दिव्य सेवाभाव में भगवान् से तुरन्त योग प्राप्त किया जा सकता है।
भक्तियोग भगवत्प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन तो है ही, साथ-साथ सरल
और उदात्त भी है। आज के युग में यह के युग में यह सब के लिए बना।
श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद