भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हृदय से विष्णुमन्दिर में जाना चाहिए। तब संसार में जन्म की दुःखमय
अवस्था का सामना नहीं करना पड़ेगा ।
विष्णु मन्दिर की परिक्रमा
‘हरिभक्तिसुधोदय’ में कहा है, "जो विष्णुमूर्ति की परिक्रमा करता
है, वह बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है ।" भवरोग के कारण
बद्धजीव पुनः पुनः जन्म-मृत्यु में भ्रमायमान् है । विष्णुमन्दिर की प्रदक्षिणा
से इस आवर्तन का निवारण हो सकता है।
चातुर्मास्य में कृष्णभावना के प्रसारण के लिए स्थान-स्थान पर
परिव्राजन करने वाले साधुजन एक स्थान पर (जो प्रायः तीर्थ होता है)
रहते हैं। इस काल में कुछ विशेष नियमों का पालन अनिवार्य है। स्कन्द-
पुराण के अनुसार इस समय विष्णुमन्दिर की चार परिक्रमा करने से
चराचर सम्पूर्ण जगत् की परिक्रमा हो जाती है।" ऐसी परिक्रमा करने
वाले ने उन सभी तीर्थों की यात्रा कर ली है, जहाँ गंगा प्रवाहित है तथा
चातुर्मास्य के विधान का पालन करने से भक्तियोग की प्राप्ति बहुत शीघ्र
हो सकती है ।
अर्चना
मन्दिर में श्रीमूर्त्ति की आराधना को अर्चना कहते हैं। इस पद्धति के
द्वारा देह से परे अपने आत्मस्वरूप का बोध हो जाता है। श्रीमद्भागवत
(१०.८१.१६) में एक ब्राह्मण के यहाँ जाते हुए श्रीकृष्ण के अन्तरंग सखा
सुदामा ने कहा है, "श्रीकृष्ण के चरणकमलों की अर्चना करने मात्र से स्वर्ग,
मोक्ष, लोकों का आधिपत्य, पृथ्वी की सार्वभौम सम्पदा और योगसिद्धियाँ
सुलभ हो जाती हैं।"
सुदामा के इस कथन की पृष्ठभूमि इस प्रकार है। श्रीकृष्ण ने सखा
सुदामा से किसी ब्रह्माण्ड के घर से अन्न की भिक्षा लाने को कहा था।
ब्राह्मण एक महायज्ञ कर रहे थे, अतः श्रीकृष्ण ने सुदामा से कहलवाया कि
कृष्ण-बलराम भूखे हैं, उन्हें कुछ भोजन चाहिए। जब सुदामा वहाँ गया
तो ब्राह्मणों ने तो कुछ नहीं दिया, परन्तु यह सुनने पर कि श्रीकृष्ण भोजन
माँगते हैं, ब्राह्मण-पत्नियां तत्काल अनेक नैवेद्य उन्हें अर्पण करने गयीं ।
‘विष्णुरहस्य’ में भी उल्लेख है, "पृथ्वी पर जो मनुष्य भगवान् विष्णु की
अर्चना करते हैं, वे नित्य आनन्दमय वैकुण्ठधाम को प्राप्त होते हैं।"
भगवान् की परिचर्या (सेवा)
'विष्णुरहस्य' में उल्लेख है, सेवक जैसे राजा की सेवा करते हैं.