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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 380 में से

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पृष्ठ 81

५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु

आदरभाव के साथ श्रीमद्भागवत का गम्भीर अध्ययन करना चाहिए ।
श्रीमद्भागवत का श्रवण-कीर्तन वह धर्मपथ है, जिससे साधक भगवत्सेवा
और भगवत्प्रेम तक उन्नति करता है ।”
शिष्य का भाव सदा यही होना चाहिए कि गुरुदेव प्रसन्न हों । तब
उसके लिए आत्मविद्या बड़ी सुगम हो जायगी । वेदों में इसका समर्थन
है और रूप गोस्वामी आगे बतायेंगे कि भगवान् और गुरु में अनन्य
श्रद्धालु के लिए सम्पूर्ण तत्त्व अपने-आप स्फुरित हो जाता है ।
श्रद्धा-विश्वास सहित गुरुसेवा
गुरु से दीक्षा ग्रहण करने के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (११.१७.२७)
में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! गुरु को मेरा रूप ही नहीं, वरन्
मेरा आत्मा ही समझना चाहिए । उन्हें साधारण मनुष्य कभी न समझे ।
साधारण मनुष्य के जैसे गुरु से कभी द्वेष न करे। उन्हें सदा श्रीभगवान्
का प्रतिनिधि मानना चाहिए । गुरु की सेवा करने से सारे देवताओं की
सेवा सम्पन्न हो जाती है ।”
साधुपुरुषों के चरणचिह्नों का अनुगमन
‘स्कन्दपुराण’ में आदेश है कि भक्त को पूर्ववर्ती आचार्यों एवं साधु-
पुरुषों का अनुगमन करना चाहिए । इससे शोक और असफलता पास
नहीं फटक सकती तथा अभीष्ट श्रेयसिद्धि हो जाती है ।
‘ब्रह्मयामलशास्त्र’ में कहा गया है, “यदि कोई शास्त्रों की विधि
को माने बिना ही बड़ा भक्त बनता है तो उसकी इन क्रियाओं से भक्ति
सिद्ध नहीं होगी; वह भक्ति के यथार्थ साधकों के मार्ग में उत्पात ही खड़ा
करेगा ।” शास्त्रविधि पर दृढ़ता से न चलने वालों को प्रायः सहजिया
कहा जाता है; वे समझते हैं कि सब कुछ सहज ही हो जाता है । अपनी
मनमानी विचारधारा के कारण वे शास्त्रविधि को नहीं मानते । ऐसे
व्यक्ति भक्तिसाधन के मार्ग में केवल उत्पातकारी हैं ।
इस संदर्भ में शास्त्र को न मानने वाले अभक्त एक तर्क कर सकते
हैं। इसका एक उदाहरण बौद्धदर्शन है । भगवान् बुद्ध का आविर्भाव उच्च
क्षत्रिय राजकुल में हुआ था; परन्तु उनका दर्शन वैदिक सिद्धान्त के
अनुकूल नहीं था, इसलिए उसे त्याग दिया गया । हिन्दू महाराज अशोक
के संरक्षण में बौद्धमत सम्पूर्ण भारत और निकटवर्ती प्रदेशों में अवश्य
फैल गया था । परन्तु महान् आचार्य शंकर का आविर्भाव होने के बाद यह
बौद्धमत भारत की सीमा से बाहर खदेड़ दिया गया ।