भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तियोग का शुद्ध स्वरूप [ ४५
पाश्चात्य जगत् में हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन हमारे गुरुमहाराज
श्रील भक्तिसिद्धान्त गोस्वामी प्रभुपाद के इसी सिद्धान्त पर आधारित
है । उसके प्रमाण के बल पर हम पाश्चात्य देशों के सभी वर्गों में ब्राह्मण
बना रहे हैं। नामधारी ब्राह्मण विरोध करते हैं कि जिसका जन्म ब्राह्मण-
जाति में नहीं हुआ हो, उसे यज्ञोपवीत धारण नहीं कराया जा सकता और
न वह उत्तम वैष्णव बन सकता है । परन्तु हम इस मत को नहीं मानते
क्योंकि यह श्रील रूप गोस्वामी अथवा विविध शास्त्रों द्वारा प्रमाणित नहीं
होता ।
श्रील रूप गोस्वामी ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि भक्तियोग
को अंगीकार कर कृष्णभावनाभावित हो जाने का मनुष्यमात्र को जन्म-
सिद्ध अधिकार है। उन्होंने नाना शास्त्रों से अनेक प्रमाण उपस्थित किए
हैं; विशेष रूप से पद्मपुराण से एक उद्धरण दिया है, जिसमें वशिष्ठ ऋषि
महाराज दिलीप से कहते हैं, "हे राजन् ! माघस्नान के समान भक्ति में
भी मनुष्यमात्र का अधिकार है।" पद्मपुराण के काशीखण्ड में और भी
प्रमाण हैं, "मयूरध्वज नामक देश में अन्त्यजों को भी भक्ति की वैष्णव
दीक्षा दी जाती है। जब वे शरीर पर तिलक तथा कण्ठ और हाथ में कण्ठी-
माला धारण करते हैं, तो साक्षात् वैकुण्ठ से आये लगते हैं । वास्तव में
उनकी शोभा साधारण ब्राह्मणों से कहीं अधिक होती है।"
अतः वैष्णव ब्राह्मणपद को पहले ही प्राप्त हो जाता है । वैष्णवों
की आचारसंहिता 'हरिभक्तिविलास' में सनातन गोस्वामी ने भी इस
विचार का समर्थन किया है। उनका स्पष्ट वाक्य है कि विधि-विधान से
वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित पुरुष निस्सन्देह ब्राह्मण हो जाता है, उसी
प्रकार जैसे पारे के मिश्रण से कांसा भी स्वर्ण बन जाता है । आचार्यों का
अनुगामी सद्गुरु किसी को भी वैष्णव दीक्षा दे सकता है, जिससे शिष्य
स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणश्रेष्ठ बन जाता है ।
श्रील रूप गोस्वामी की साथ-साथ चेतावनी है कि सद्गुरु का
दीक्षित शिष्य यह न समझे कि दीक्षा मात्र से वह कृतकार्य हो गया है।
विधि-विधान का दृढतापूर्वक पालन तब भी बड़ा आवश्यक है। यदि कोई
गुरु से दीक्षा ग्रहण करके भक्ति की विधि का अनुसरण नहीं करता, तो
फिर गिर जाता है। सावधानीपूर्वक सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह
भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य विग्रह का भिन्न-अंश है, अतः उसका कर्तव्य
बनता है कि पूर्ण परात्पर श्रीकृष्ण की सेवा करे । यदि हम श्रीकृष्ण की
सेवा में प्रमाद करेंगे तो फिर गिर जायेंगे । भाव यह है कि केवल दीक्षित