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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 380 में से

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पृष्ठ 358

करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस [ ३३१
मथुरा पर आक्रमण करते हुए क्रुद्ध जरासन्ध ने श्रीकृष्ण पर व्यंग्य-
भरी दृष्टि डाली। उस समय बलरामजी ने अपना हल धारण कर लिया
और जरासन्ध को लाल-लाल आँखों से देखने लगे ।
'विदग्धमाधव' के एक श्लोक में श्रीमती राधारानी क्रोध की मुद्रा
में अपनी माता से बोलीं। राधारानी पर श्रीकृष्ण के पास जाने का आरोप
लगाया गया था। वे कहने लगीं, "हे माता! मैं तुमसे क्या कहूँ ? कृष्ण ऐसा
निर्दयी है कि अनेक बार मार्ग में मुझ पर आक्रमण करता है और यदि मैं
रोना भी चाहूँ तो यह मोरमुकुटधारी धूर्त मेरे मुख को ढक लेता है, जिससे
मैं रो भी नहीं पाती। यदि मैं उससे डरकर वहाँ से भागना चाहूँ तो वह
तुरन्त मेरा मार्ग रोक लेता है। यदि मैं दीन भाव से उसके चरणों में गिर
जाऊँ तो वह मधुसूदन क्रोध में भरकर मेरे मुख को काटता है। हे माता !
मेरी परिस्थिति को समझने का प्रयत्न करो। मुझ पर अनावश्यक क्रोध न
करो। मुझे डाँटने के स्थान पर बताओ कि मैं कृष्ण के इन भयंकर
आक्रमणों से कैसे बचूँ ?"
कभी-कभी बराबर वालों में श्रीकृष्ण के प्रेम को लेकर क्रोध के
भाव प्रकट होते हैं। इसका एक उदाहरण जटिला और मुखरा की लड़ाई
है। जटिला राधारानी की सास थी और मुखरा उसकी नानी थी। ये
दोनों चर्चा कर रही थीं कि किस प्रकार मार्ग में जाती हुई राधारानी को
कृष्ण व्यर्थ सताया करता है। मुखरा बोली, "हे दुर्मुखी जटिले ! तेरी
बातों को सुनकर मेरे हृदय और मस्तिष्क दोनों में आग लगी जा रही है।
तेरा यह कहना किसी प्रमाण के बिना है कि कृष्ण मेरी दौहित्री (लड़की की
पुत्री) राधारानी को छेड़ता है।"
एक बार जब राधारानी श्रीकृष्ण के दिए हुए रत्नहार को उतार
कर रख रही थीं तो उनकी सास जटिला एक सखी से कहने लगी, "हे
सखि ! इस सुन्दर हार को देख जो कृष्ण ने राधारानी को भेंट किया है।
वह अब उसे पकड़े हुए है और फिर भी हमें यह बतलाना चाहती है कि
उसका कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस लड़की की क्रिया ने तो हमारे
सारे कुल को कलंकित कर दिया है।"
शिशुपाल जैसे व्यक्तियों में श्रीकृष्ण के लिये प्राप्त होने वाली
स्वाभाविक ईर्ष्या को श्रीकृष्ण के साथ रौद्रभक्तिरस नहीं माना जा
सकता ।