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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 380 में से

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पृष्ठ 351

३२४ ] भक्त्तिरसामृतसिन्धु
क्रिया के उद्दीपन माने जाते हैं। जब श्रीकृष्ण उनके घर पुत्र रूप से अव-
तरित हुए तो नन्द महाराज ने शुद्धभाव से अपने पुत्र के लिये सम्पूर्ण मंगल
की कामना की। वे सब ब्राह्मणों को मूल्यवान गायों का दान देने लगे।
इस दानक्रिया से ब्राह्मण इतने सन्तुष्ट हुए कि उन्हें कहना पड़ा कि नन्द
महाराज ने अपने दान से महाराज पृथु और नृग जैसे पूर्ववर्ती उदार
राजाओं को भी हरा दिया।
जब कोई भगवान् की कीर्ति को पूर्णरूप से जानता है और इस
लिये उनके लिये सर्वस्व अर्पण करने को तैयार रहता है तो उसे सम्प्रदानक
कहते हैं।
जिस समय महाराज युधिष्ठिर राजसूय मण्डलयज्ञ में श्रीकृष्ण के
साथ जा रहे थे तो वे मन ही मन श्रीकृष्ण के शरीर में चन्दन का आलेप
करने लगे और गले में अजानुलम्बित माला सुशोभित करने लगे। उन्होंने
श्रीकृष्ण को सोने की कसीदाकारी से युक्त वस्त्रालंकार पहनाए और
नाना रत्नों से विभूषित अलंकारों से अलंकृत किया। श्रीकृष्ण को
बहुत से सुसज्जित हाथी, घोड़े और रथ भी दिए। उन्होंने आगे श्रीकृष्ण को
अपने सारे राज्य, अपने परिवार और स्वयं अपनी आत्मा तक का दान
करने का संकल्प किया। ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पाया कि वास्तव
में श्रीकृष्ण को दान देने के लिये ऐसा कुछ भी नहीं है तो महाराज
युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और व्याकुल हो उठे।
इसी प्रकार महाराज बलि ने एक समय अपने पुरोहित शुक्राचार्य
से कहा था, "हे ऋषे ! आप वेदों के ज्ञान में पूर्ण निष्णात् हैं और इसलिए
वैदिक कर्मकाण्ड के द्वारा भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं। जहाँ तक
इन वामन देव ब्राह्मण का सम्बन्ध है; ये चाहे स्वयं भगवान् विष्णु हों,
कोई साधारण ब्राह्मण हों अथवा मेरे शत्रु ही क्यों न हों, मैंने संकल्प कर
लिया है कि इनके द्वारा माँगी गई सारी भूमि इन्हें अवश्य दूंगा।" महा-
राज बलि इतने भाग्यवान् थे कि भगवान् ने उनके आगे अपने उसी हाथ
को फैलाया जो लक्ष्मीदेवी के कुंकुम उपलिप्त वक्षःस्थल के स्पर्श से लाल
सा हो गया। भाव यह है कि यद्यपि श्रीभगवान् की ऐसी अपार महिमा है
कि साक्षात् लक्ष्मीदेवी उन्हें आनन्द प्रदान करने के लिये उनके आधीन
रहती हैं; फिर भी उन्होंने बलि महाराज से दान लेने के लिये अपना हाथ
फैलाया।
जो पुरुष श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व दान करना चाहता है, परन्तु
बदले में कुछ नहीं चाहता वह सच्चा त्यागी समझा जाता है। अतएव