भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४६
अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस
अद्भुतभक्तिरस
अद्भुतभक्तिरस की अनुभूति दो प्रकार से होती है—प्रत्यक्ष रूप
से अपनी आँखों के अनुभव के द्वारा और परोक्ष रूप से दूसरों से सुनकर ।
जब नारदजी द्वारका में भगवान् की लीलाओं को देखने आये तो
उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण उसी रूप में अनेक महलों में विराजमान हैं और
नाना क्रियाएँ कर रहे हैं। यह सब देखकर वे आश्चर्यचकित रह गये । यह
साक्षात् अद्भुतभक्तिरस का उदाहरण है। यशोदा मैया की एक सखी ने
कहा, "हे यशोधरे ! जरा इस आनन्द को तो देखो ! एक ओर तो तुम्हारा
नन्हा सा बालक है जो सदा तुम्हारा स्तनपान करने को मुग्ध रहता है
और दूसरी ओर यह विशाल गोवर्धन पर्वत है जो गगन को छू रहा है।
फिर भी देखो कैसा आश्चर्य है कि यह महान् गोवर्धन तुम्हारे पुत्र के नन्हे
हाथ की उँगली पर ठहरा हुआ है, मानो कोई खिलौना हो। क्या यह
महान् विस्मय की बात नहीं है ?" यह भी साक्षात् अद्भुतभक्तिरस का
दृष्टान्त है।
परोक्ष अद्भुतभक्तिरस का अनुभव महाराज परीक्षित को हुआ
जब उन्होंने शुकदेव गोस्वामी के मुख से श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध
का वर्णन सुना, जो ग्यारह अक्षौहिणी सेना के साथ श्रीकृष्ण के साथ युद्ध
कर रहा था। एक अक्षौहिणी सेना में हजारों हाथी, हजारों घोड़े और
रथ तथा लाखों सैनिक रहते हैं। नरकासुर के पास ऐसी ग्यारह अक्षौहिणी
सेना थी और वे सब श्रीकृष्ण पर बाण चला रहे थे। परन्तु फिर भी
श्रीकृष्ण ने अपनी ओर से केवल तीन बाण चलाकर उन सबका नाश कर
दिया। जब महाराज परीक्षित ने इस अद्भुत विजय को सुना तो वे तुरन्त
अपने नेत्रों से विगलित अश्रुधारा को पोंछते हुए हर्षातिरेक में मग्न हो
गये। यह सुनने से होने वाला परोक्ष अद्भुतभक्तिरस है।