सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

२७२] भक्तिरसामृतसिन्धु
मानना; श्रीकृष्ण की सहायता के बिना अपने को निरन्तर अयोग्य समझना
तथा श्रीकृष्ण के आगे सब प्रकार से दीनता का भाव धारण किये रहना,
चाहे स्वयं कुछ करने की योग्यता भी हो। जब यह दृढ़ विश्वास हो जाये कि
श्रीकृष्ण सदा-सर्वदा नित्य रक्षा करेंगे तो इस भाव को गौरवप्रीति
कहते हैं। गौरवप्रीति श्रीकृष्ण और उनके अन्य रक्षित भक्तों के सम्बन्ध में
होती है।
जिस समय श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, यदुवंश के वयो-
वृद्ध पुरुष प्रायः उनके सामने महत्त्वपूर्ण विषयों को रखते थे। ऐसे समय
श्रीकृष्ण सावधानीपूर्वक इन विषयों पर ध्यान देते थे। यदि कोई
हँसने योग्य बात होती तो वे तुरन्त मंद-मंद मुस्कराने लगते। कभी-कभी
सुधर्मा सभा में राजकीय कर्तव्यों का पालन करते हुए श्रीकृष्ण वृद्ध
सदस्यों से सत्परामर्श माँगते। इन सब कार्य-कलापों से वे महागुरु,
महाकीर्तिशाली, महाबली, रक्षक वाले आदि गुणों को प्रकट करते हैं।