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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 380 में से

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पृष्ठ 291

२६४ भक्तिरसामृतसिन्धु
राग कहते हैं। राग में सब प्रकार के दुःखों का शान्तिपूर्वक सामना करने
की योग्यता आ जाती है। मृत्यु का भय उपस्थित होने पर भी ऐसा भक्त
भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा से अपने को वंचित नहीं करता। प्रेम का
गौरवमय उदाहरण राजा परीक्षित ने उपस्थित किया है। उनकी मृत्यु
आसन्न थी और वे सम्पूर्ण विश्व में फैले अपने राज्य से वंचित हो चुके थे।
जीवन के शेष सात दिनों में उन्होंने जल की एक बूँद भी ग्रहण
नहीं की थी। फिर भी शुकदेव गोस्वामी से भगवान् की दिव्य लीलाकथा
को सुनते हुए उन्हें लेशमात्र भी दुःख न था। इसके विपरीत, वे शुकदेव
गोस्वामी के संग में प्रत्यक्ष दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे थे।
एक भक्त का विश्वास इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है—"यदि मुझे
श्रीकृष्ण की कृपा का एक बिन्दु भी मिल जाये तो फिर मैं अग्नि अथवा
सागर से घिरा होने पर भी सब प्रकार से चिन्तामुक्त रहूँगा। परन्तु
यदि मैं उनकी अहैतुकी कृपा से वंचित रहूँ तो फिर द्वारका का राजा बन
जाने पर राज्य का सिंहासन भी मेरे लिये कुशकंटक के समान होगा।"
महाराज परीक्षित और उद्धव जैसे सब भक्त स्नेह के आधार पर
राग में स्थित हैं। इस प्रकार के स्नेह में सख्यभाव का लेश प्रकाशित
होता है। सब प्रकार के सांसारिक द्वेषों से मुक्त होने पर जब उद्धव को
भगवान् का दर्शन हुआ तो उनका कण्ठ रुद्ध हो गया और वे कुछ न बोल
सके। केवल अपने भ्रू-विलास से ही भगवान् का आलिंगन कर रहे थे।
महान् विद्वानों ने ऐसी प्रीति को दो भागों में विभाजित किया है—अयोग
तथा योग। यदि भक्त को साक्षात् श्रीकृष्ण का संग प्राप्त नहीं है तो उसे
विद्वानों ने अयोग कहा है। इस प्रकार उनके प्रेम में चित्त निरन्तर उनके
चरणकमलों में एकाग्रित रहता है। ऐसा भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण के दिव्य
गुणगणों का अनुसन्धान किया करता है। उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण
भगवान् का संग प्राप्त करना है।
'नृसिंहपुराण' में राजा इक्ष्वाकु के सम्बन्ध में एक वाक्य है—जिससे
इस प्रेमभाव का उदाहरण मिलता है--' श्रीकृष्ण के प्रति अत्यन्त स्नेह के
वश राजा इक्ष्वाकु काले मेघ, काले मृग की काली आँखों और कमल
जिसको सदा भगवान् की आंखों की उपमा दी जाती है, इन सब पदार्थों
में आसक्त हो गये।" श्रीमद्भागवत (१०.३८.१०) में अक्रूर सोचते हैं, "इस
समय श्रीभगवान् साक्षात् इस धरती पर भार हरण के लिये विद्यमान हैं,
और सबको अपने निज रूप में दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे में जब हम
उन्हें अपने सामने पाते हैं तो क्या यह हमारे नेत्रों की परम कृतार्थता नहीं