भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
अवहित्था, बोध, स्वप्न, क्लम, व्याधि, मृत्यु इत्यादि । श्रीकृष्ण से संयोग
होने पर भक्त में हर्ष, गर्व, धृति, आदि लक्षण होते हैं और जब उसे
श्रीकृष्ण से अति विरह का अनुभव होता है तो मोह, व्याधि, मृत्यु आदि
लक्षण प्रधान रहते हैं ।
श्रीमद्भागवत (१.११.५) में उल्लेख है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण
कुरुक्षेत्र के युद्ध से अपने घर द्वारका लौटे तो सारे द्वारकावासी उनसे उसी
प्रकार वार्तालाप करने लगे जैसे कोई बालक विदेशों को गये पिता से घर
लौटने पर प्रेमपूर्वक बात करता है। यह हर्ष का उदाहरण है ।
जब मिथिला नरेश बहुलाश्व ने श्रीकृष्ण को अपने महल में देखा
तो उसने संकल्प किया कि वह कम से कम सौ बार उन्हें दण्डवत् प्रणाम
करेगा। परन्तु वह प्रेम के भाव में ऐसा विभोर हुआ कि केवल एक बार
प्रणाम कर के अपनी स्थिति को भूल गया और फिर वापस नहीं उठ सका ।
स्कन्दपुराण में एक भक्त भगवान् श्रीकृष्ण से कहता है, “हे
स्वामिन् ! जैसे सूर्य अपने प्रबल तेज से भूमि के सारे जल को सुखा डालता
है उसी प्रकार मेरी मनोव्यथा ने मेरे मुख और शरीर के सारे तेज को
सुखा डाला है। इसका कारण केवल आपका विरह है। "यह प्रेम में क्लम
का उदाहरण है ।
निर्वेद की अभिव्यक्ति देवराज इन्द्र के कथन में है। उसने सूर्यदेव
को देखा तो कहने लगा, "हे सूर्य ! तुम्हारी ज्योति धन्य है क्योंकि यह
श्रीकृष्ण के चरणकमलों तक पहुँच रही है, जो यदुवंश के नायक हैं। मेरे
हजार नेत्र भी निरर्थक ही सिद्ध हुए हैं,क्योंकि एक क्षण के लिये भी ये
भगवान् के चरणारविन्द को नहीं देख पाये ।"
सम्भ्रम प्रीति उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होकर प्रेम में परिवर्तित हो
जाती है। उससे आगे स्नेह और आगे बढ़कर राग का रूप धारण कर
लेती है। श्रीमद्भागवत (१०.३८.६) में अक्रूर कहते हैं—"आज मेरे सब
पापों का नाश हो गया है और जीवन धन्य-धन्य हो चुका है क्योंकि आज
मैं योगियों के लिये ध्यान में भी दुर्लभ भगवान् के चरणकमलों को प्रणाम
करूँगा ।"
एक अन्य भक्त अपने सम्भ्रम प्रीतिभाव में कहने लगा, "मेरे
जीवन में वह धन्यातिधन्य दिन कब होगा जब मैं यमुना तट पर भगवान्
श्रीकृष्ण को गोपाल वेष में खेलते देख सकूँगा ।"
जब इस प्रीति में ह्रास की शंका नहीं रहती उस समय भक्त प्रेम