भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३६
प्रीतिभक्तिरस
श्रीधर स्वामी जैसे आचार्यों ने प्रीति को भक्तिरस का एक सिद्धरूप
माना है। यह ठीक शान्तरस के ऊपर है और दास्यरस के विकास के लिये
अनिवार्य है। 'नामकौमुदी' नामक शास्त्र में इस अवस्था को श्रीकृष्ण के
लिये रति स्थायिभाव माना है। शुकदेव आदि आचार्य प्रीति की अवस्था
को शान्तरस में मानते हैं। चाहे जो हो, इस प्रीति का भक्तजन नाना
स्वादों में आस्वादन करते हैं। इसलिये इसका सामान्य नाम प्रीति है
अर्थात् श्रीकृष्ण के लिये शुद्ध रति।
दास्यभाव वाले भक्त श्रीकृष्ण में सम्भ्रम प्रीति रखते हैं ।
गोकुल (इस लोक में वृन्दावन ) के कुछ निवासी श्रीकृष्ण में इसी
प्रकार का स्नेह रखते हैं। वृन्दावनवासी कहते हैं, "श्रीकृष्ण निरन्तर
हमारे सामने घनश्यामाकृति में अभिव्यक्त रहते है । उन्होंने अपने
करारविन्द में अद्भुत वंशी धारण कर रखी है। पीताम्बर में सुशोभित
हैं। सिर पर मोरमुकुट धारी हैं । जब श्रीकृष्ण इस सब निज रूप में
गोवर्धन के निकट चलते है तो स्वर्ग और पृथ्वी के सारे निवासियों को
दिव्य आह्लाद का अनुभव होता है और वे सब अपने को उनका शाश्वत्
दास समझते हैं।" विष्णु श्रीकृष्ण के समान ही वस्त्र धारण किये रहते हैं
और उनका वर्ण भी वही है। इसलिये कभी-कभी भक्त उनके चित्र को
देखकर भी उसी सम्भ्रम और गौरव भाव से भर जाते हैं। दोनों में भेद
केवल इतना है कि विष्णु चतुर्भुज हैं, जिनमें वे शंख, चक्र, गदा, और
पद्म, धारण किये रहते हैं। इसके अतिरिक्त वे चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त
आदि अनेक अमूल्य रत्नों से सुशोभित हैं।
श्रीरूप गोस्वामी के 'ललितमाधव' में श्रीकृष्ण के दास का यह
वाक्य है—"निःसन्देह कौस्तुभ मणि से युक्त होने के कारण भगवान् विष्णु
बड़े सुन्दर हैं। अपने चारों हाथों में उन्होंने शंख, चक्र, गदा और पद्म