भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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प्रतीत होता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । अन्यथा भगवान् राम के
महाभक्त हनुमान् जी रामायण में वर्णित भगवान् राम के चरित्र का नित्य-
पाठ क्यों करते । वास्तविकता यह है कि उपरोक्त भक्ति के १२ रसों में
से किसी भी रस में सब कुछ दिव्य आनन्ददायी है ।
श्रीलरूप गोस्वामी इस सन्दर्भ में उन लोगों के लिये शोक करते हैं
जो मिथ्या वैराग्य की अग्नि में तप रहे हैं । मिथ्या वैराग्य, शुष्क ज्ञान और
कुतर्कों की अग्नि में तपते हुए वे भक्तियोग की उपेक्षा कर देते हैं। जो वेदों
के कर्मकाण्ड और निर्विशेष ब्रह्म में आसक्त हैं वे भक्तियोग के दिव्य आनन्द
का आस्वादन नहीं कर सकते । अतएव श्रील गोस्वामी का परामर्श है
कि जिन्हें यह महामृत प्राप्त है वे भक्ति के रसिक बड़ी सावधानी से शुष्क
ज्ञानियों, स्वर्ग के अभिलाषी कर्मियों और निर्विशेष मोक्षकामियों से अपनी
भक्ति की रक्षा करें । भक्तों को अपने भगवत्प्रेम रूप महारत्न को चोरों
से बचाना चाहिये । भाव यह है कि शुद्धभक्त को उन्हें भक्तियोग और
उसके विभिन्न तात्त्विक पक्षों का विवरण नहीं सुनाना चाहिये, जो
केवल शुष्क ज्ञानी हैं अथवा मिथ्या वैराग्य का अभिमान रखते हैं ।
जो भक्त नहीं हैं उनके लिये भक्तिरस सर्वथा दुरूह है । अभक्त इस
भक्तिरस के महत्त्व को, इसकी महिमा-गरिमा को कभी नहीं समझ सकता ।
उन्हें भक्तियोग का लाभ कभी नहीं मिल सकता । जिन्होंने भगवान् के
चरणों में अपना जीवन-सर्वस्व चढ़ा दिया है वे भक्तजन ही यथार्थ भक्ति-
रसामृत का आस्वादन कर सकते हैं ।
भक्त जब भावना के पथ का उल्लंघन करके शुद्ध सत्त्व की सर्वोच्च
भावभूमि पर आरूढ़ हो जाता है तब हृदय का सब प्रकार के दोषों से
परिष्कार हो जाता है । जीवन की उस शुद्ध अवस्था में इस अमृत का
आस्वादन हो सकता है । आस्वादन की इसी योग्यता का नाम रस है ।
इति भक्तिरसामृतसिन्धौ भक्तिरससामान्य निरूपणनामा दक्षिणो विभागः ॥
इति भक्तिवेदान्त भाष्ये दक्षिणो विभागः ॥२॥