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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 380 में से

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पृष्ठ 263

२३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
की अनुगति की लालसा स्फुरित होती है। कृष्णविषयारति सीधे श्रीकृष्ण
के लिए कभी अभिव्यक्त नहीं होती। इसके लिए गोलोक वृन्दावन में
श्रीकृष्ण के किसी नित्य पार्षदों के चरणचिन्हों की अनुगति आवश्यक है।
जब कृष्णविषयक रस आपस में मिल जाते हैं—जैसे सख्य, दास्य, और
वात्सल्य का परस्पर मिल जाना, तो परिणाम में होने वाली रति को
संकुला रति (स्वाद) कहते हैं। ऐसे मिश्रित स्वाद उद्धव भीम, मुखरा नामक
यशोदा मैय्या की धात्री आदि भक्तों में उदित होते हैं। संकुलारति
में भी किसी एक रस का निरन्तर प्राधान्य रहता है। उसी प्रधान रस को
भक्त का श्रीकृष्ण से मुख्य सम्बन्ध माना जाता है। उदाहरण के लिए
उद्धव का श्रीकृष्ण से सख्यभाव है। परन्तु उद्धव के चरित्र में श्रीकृष्ण के
लिए दास्यभाव भी दृष्टिगोचर होता है। इसका नाम सम्भ्रम सख्यभाव है।
दूसरी ओर श्रीदामा और सुदामा जैसे सखाओं द्वारा अभिव्यक्त सखाभाव
सम्भ्रम से बिल्कुल रहित है।
प्रीति
जो भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण को आराध्य मानते हैं वे कृष्ण के अनु-
ग्राह्य माने जाते हैं। उनकी रति प्रीति कहलाती है। ऐसे भक्त को श्रीकृष्ण
के प्रति अपनी आधीनता बड़ी प्रधान रहती है और इसलिये वह कदाचित्
ही किसी अन्य रस में रुचि लेता है।
मुकुन्दमाला में राज कुलशेखर कहते हैं—"हे प्रभो ! आप जीवों का
संसार रूपी नरक से उद्धार करने वाले हैं परन्तु अपने विषय में मुझे
यह चिन्ता नहीं। मुझे चाहे स्वर्ग में रहना हो अथवा पृथ्वी पर अथवा
चाहे नरक में ही क्यों न भेज दिया जाये मेरे लिये इसका कोई महत्त्व
नहीं। मेरी केवल इतनी ही अभिलाषा है कि शरत् कालीन कमलों के
समान सुन्दर आपके चरणों का ध्यान मरते समय भी मैं करता रहूँ।"
सख्य
जहाँ तक सख्य का सम्बन्ध है, जो उच्च कोटि के भक्त श्रीकृष्ण
के प्रायः तुल्य हैं वे भगवान् से सख्यभाव के सम्बन्ध में अधिकारी माने
जाते हैं, सख्यभाव के स्तर पर नाना प्रकार के परिहास, अट्टहास
आदि होते हैं। इस प्रकार के सख्य सम्बन्ध का एक उदाहरण श्रीमद्भागवत
में है जहाँ श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं—"गोचारण के समय मेरे आज सुन्दर