भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
प्रारम्भ में जन्म होने पर एक बालक केवल अपने माता-पिता
से प्यार करना जानता है; फिर भाई-बहन इत्यादि उसके प्रेम के
पात्र बनते हैं और इस प्रकार दिन-प्रतिदिन जैसे-जैसे वह बढ़ता
जाता है वैसे-वैसे ही अपने परिवार, समाज, जाति, राष्ट्र, यहाँ तक
कि पूरे मानव-समाज से भी प्रेम करने लगता है। परन्तु सारी मानव-
जाति को प्रेम करने से भी जीव की प्रेमप्रवृत्ति सन्तुष्ट नहीं होती। वह
प्रेम की प्रवृत्ति तब तक अपूर्ण ही रहेगी जब तक हम यह न जान लें
कि प्रेम का परम पात्र कौन है। हमारा प्रेम तभी पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो
सकता है जब उसका समर्पण श्रीकृष्ण के चरणों में हो जाये। यह भाव
'भक्तिरसामृतसिन्धु' का सारसर्वस्व है। इसीलिये इस ग्रन्थ में पाँच दिव्य
रसों, अर्थात् सम्बन्धों में श्रीकृष्ण से प्रेम करने की शिक्षा दी गई।
हमारी प्रेम करने की प्रवृत्ति प्रकाश की किरण अथवा हवा के
झकोरे के समान ही नित्य फैलती रहती है; परन्तु इसके अन्त को हम
नहीं जानते। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' उस विज्ञान का नाम है जो हमें यह
दिखाता है कि श्रीकृष्ण को प्रेम करने की सुगम विधि से जीवमात्र से
पूर्ण रूप में प्रेम किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे महान् प्रयत्नों के
द्वारा भी हम मानव-समाज में शान्ति और सद्भावना उत्पन्न करने में
असफल रहे हैं क्योंकि हमें ठीक विधि का ज्ञान नहीं है। विधि बड़ी
सरल है; परन्तु इसे ठण्डे मस्तिष्क से समझने की आवश्यकता है। 'भक्ति-
रसामृतसिन्धु' सब मनुष्यों को भगवान् श्रीकृष्ण से प्रेम करने की सुगम
और स्वाभाविक विधि की शिक्षा देती है। यदि हम कृष्ण से प्रेम करना
सीख लें तो फिर इसके साथ ही बिना किसी कठिनाई के तुरन्त जीव-
मात्र से भी प्रेम करने लगेंगे। यह पेड़ की जड़ को जल से सींचने अथवा
उदर में भोजन पहुँचाने जैसा है। पेड़ की जड़ में जल डालना अथवा उदर
को भोजन पहुँचाना सार्वभौम रूप से युक्तिसंगत और व्यावहारिक है। ऐसा
हम सबका अनुभव है। हम भली प्रकार जानते हैं कि जब हम कुछ खाते
हैं अथवा जब हम कोई पदार्थ उदर को देते हैं तो इस क्रिया से उत्पन्न
शक्ति तुरन्त सम्पूर्ण देह में वितरित हो जाती है। उसी प्रकार जड़ में
जल देने से बड़े से बड़े वृक्ष के अंग-प्रत्यंग को लाभ पहुँचता है। यदि हम
चाहें कि वृक्ष के एक-एक अंग को जल दें तो यह सम्भव न होगा और न
ही देह के अलग-अलग अंग भोजन कर ही सकते हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु'
ग्रन्थ उस एक दीपक को जलाने की शिक्षा देगा जिससे तुरन्त सब ओर सब