भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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जाती है। अतएव नास्तिकों के लिये मृत्यु को भगवान् का रूप माना
जाता है। भक्त भक्तियोग के द्वारा भगवान् के सान्निध्य का अनुभव
करते हैं और नास्तिक उनका साक्षात्कार मृत्यु के रूप में करते हैं। मृत्यु
होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। एक नई अवस्था में जो पिछली
अवस्था से श्रेष्ठ अथवा अधम हो सकती है, जीवन का एक नया अध्याय
शुरू करना होता है। राजनीतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय
—किसी भी क्रियाक्षेत्र में सारे कर्मों का फल जीवन के साथ ही समाप्त
हो जायगा। यह बिलकुल निश्चित है।
परन्तु भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में अनुभव में आने वाला
भक्तिरस जीवन के अन्त के साथ समाप्त नहीं होता। वह निरन्तर बना
रहता है और इसीलिये उसे अमृत कहते हैं। सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों में
इसका प्रमाण है। भगवद्गीता कहती है—'भक्तिरस में थोड़ी भी उन्नति
भक्त को परम भय से अर्थात् मानव-जीवन के अवसर को खो देने से होने
वाले भय से बचा सकती है। सामाजिक जीवन, पारिवारिक जीवन
अथवा परोपकार, मानवतावाद, राष्ट्रवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि
बृहद् पारिवारिक जीवनों के भावों से होने वाले रस इस बात की गारण्टी
नहीं दे सकते कि हमारा अगला जन्म भी मनुष्य के रूप में ही होगा। इस
जीवन में अपनी वास्तविक क्रियाओं के द्वारा हम अपने अगले जीवन की
रचना कर रहे हैं। जीवात्मा अपनी देह में जो काम करता है उसी के
फलस्वरूप उसे अगले जन्म में देह की प्राप्ति होती है। इन सब क्रियाओं
का लेखा-जोखा दैव के हाथ में है। भगवद्गीता में इस दैव को सबका
प्रधान कारण बतलाया गया है। श्रीमद्भागवत में भी उल्लेख है कि
पुनर्जन्म में नई देह की प्राप्ति 'दैवनेत्रेण' अर्थात् भगवान् के निर्देशानुसार
होती है। साधारण अर्थ में दैव भाग्य को कहते हैं। दैव का विधान हमें
चौरासी लाख योनियों में से उपयुक्त देह देता है। इसका चयन हमारी
इच्छा के अनुसार नहीं, हमारे भाग्य के अनुसार होता है। यदि हमारी
वर्तमान देह कृष्णभावनाभावित क्रियाओं में लगी हुई है तो इस बात की
गारण्टी है कि अगले जन्म में हमें कम से कम मनुष्य की योनि तो अवश्य
ही मिलेगी। यदि कोई कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण है तो यह
निश्चित है कि भक्तियोग को पूर्ण न कर पाने की अवस्था में उसे मानव-
समाज में उच्च वर्गों में जन्म की प्राप्ति होगी जिससे वह स्वतः कृष्ण-
भावना में आगे उन्नति कर सके । अतएव कृष्णभावनाभावित सभी
प्रामाणिक क्रियाएँ अमृत हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का यही विषय है।