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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 380 में से

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पृष्ठ 141

११४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
'महाकूर्मपुराण' में उल्लेख है, "अग्निपुत्र महात्माओं ने श्रीकृष्ण के
माधुर्यप्रेम की प्राप्ति के लिए बड़ी दृढ़ता से विधिभक्ति का आचरण किया ।
परिणामतः पुनर्जन्म में वे सम्पूर्ण सृष्टि के कारण वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण
का संग कर सके । उनमें से प्रत्येक को पतिरूप में श्रीकृष्ण की प्राप्ति
हुई ।"
वात्सल्य और सख्य
अपने को माता-पिता अथवा सखा मान कर श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट
हुए भक्तों को क्रमशः नन्दमहाराज और सुबल आदि का अनुसरण करना
चाहिए । नन्दमहाराज श्रीकृष्ण के पिता हैं और ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण के
सारे सखाओं में सुबल सबसे अंतरंग हैं ।
वात्सल्य अथवा सख्य के विकास के दो प्रकार हैं । एक विधि तो
स्वयं श्रीकृष्ण का पिता बन जाने की चेष्टा करना है और दूसरी विधि
नन्दमहाराज की अनुगति करते हुए श्रीकृष्ण के पितृत्व की कामना रखना
है । इनमें स्वयं श्रीकृष्ण का पिता बनने का प्रयास निषिद्ध है । यह विधि
वास्तव में मायावाद से दूषित है । मायावादी समझते हैं कि वे स्वयं कृष्ण
हैं । इसी प्रकार यदि कोई यह समझे कि वह स्वयं नन्दमहाराज बन गया
है तो उसका वात्सल्यप्रेम मायावाद से कलंकित हो जायगा । मायावाद की
विधि से मनन करना अपराध माना गया है और कोई भी अपराधी वैकुण्ठ
जगत् में जाकर श्रीकृष्ण का संग नहीं कर सकता ।
'स्कन्दपुराण' में पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर के एक वृद्ध
निवासी की कथा है, जो श्रीकृष्ण को अपने प्रिय बालक के रूप में चाहता
था । नारदजी ने उसे नन्दमहाराज की अनुगति का उपदेश किया और इस
प्रकार वह परम सिद्ध हो गया ।
नारायणव्यूहस्तव में कहा गया है कि जो नित्य-निरन्तर पति, पुत्र,
सुहृद, मित्र, पिता के रूप में भगवान् का चिन्तन करते हैं, वे सदा सब के
आराध्य हैं । इस रागानुगा कृष्णभक्ति का उदय केवल श्रीकृष्ण अथवा
उनके शुद्धभक्त की कृपा से ही हो सकता है । इसे पुष्टिमार्ग भी कहते हैं
(पुष्टि अर्थात् वर्धन) । भावों का इस प्रकार का विकास भक्ति को सर्वोच्च
स्तर तक बढ़ाता है । इसीलिए इसकी 'पुष्टिमार्ग' संज्ञा है । विष्णु स्वामी
वैष्णव सम्प्रदाय के अन्तर्गत वल्लभ सम्प्रदाय इसी पुष्टिमार्ग से श्रीकृष्ण
की उपासना करता है । गुजरात के भक्तों में प्रायः पुष्टिमार्ग से बालकृष्ण
की उपासना प्रचलित है ।