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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 380 में से

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पृष्ठ 136

रागानुगाभक्ति [ १०६
के लिए गोपियों के भावमय प्रेम को कभी-कभी विद्वानों द्वारा प्राकृत-
जगत् के काम जैसा कह दिया जाता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है।
यह तो अनिर्वचनीय स्थिति को समझाने की एक भंगी मात्र है।
उद्धव जैसे महाभागवत भगवान् श्रीकृष्ण के प्राणप्रिय हैं। वे भी
गोपियों की अनुगति को लालायित रहते हैं। अतः गोपियों का कृष्णप्रेम
प्राकृत काम कदापि नहीं हो सकता। अन्यथा उद्धव जी उनके चरणचिह्नों
का अनुगमन करना क्यों चाहते ? स्वयं श्रीचैतन्य महाप्रभु इसके अन्यतम-
धन्यतम उदाहरण हैं। संन्यास आश्रम ग्रहण करने के बाद वे स्त्रीसंग-त्याग
के सम्बन्ध में बड़े ही कठोर थे। फिर भी उन्होंने सिखाया है कि गोपियों
द्वारा प्रवर्तित मार्ग श्रीकृष्ण की आराधना का सर्वोत्तम पथ है। इस प्रकार
कामप्रेरित दीखने वाली गोपियों के श्रीकृष्ण-आराधना के मार्ग की
श्रीचैतन्य महाप्रभु ने बड़ी महिमा गायी है। इस सत्य से स्पष्ट है कि यद्यपि
श्रीकृष्ण में गोपियों का आकर्षण कामप्रेरित प्रतीत होता है, परन्तु वह
प्राकृत बिलकुल नहीं है। पूर्ण रूप से शुद्धसत्त्व में स्थित हुए बिना तो
श्रीकृष्ण से गोपीजनों के दिव्य सम्बन्ध को जाना भी नहीं जा सकता।
परन्तु सामान्य युवक-युवतियों का कामक्रीड़ा में लगने के कारण उसे कभी-
कभी मिथ्या रूप से प्राकृत-जगत् का काम समझ लिया जाता है। दुर्भाग्य-
वश, जो गोपीजनों और श्रीकृष्ण के प्रेममय सम्बन्ध के दिव्य स्वरूप को
समझने में असमर्थ हैं, वे लोग यह पूर्वाग्रह कर बैठते हैं कि श्रीकृष्ण और
गोपियों का प्रेमविनिमय प्राकृत क्रिया है। इसीलिए वे आधुनिक कला में
उसपर मनमाने चित्र बनाने का दुस्साहस भी कर बैठते हैं।
दूसरी ओर, कुब्जा की रति को विद्वानों ने 'कामप्राया' कहा है।
कुब्जा, अर्थात् कुबड़ी को भी श्रीकृष्ण की प्रगाढ़ तृष्णा थी। परन्तु श्रीकृष्ण
के लिए उसकी अभिलाषा प्रायः प्राकृत ही थी, अतएव उसकी रति की
गोपीप्रेम से तुलना नहीं हो सकती। इसीलिए श्रीकृष्ण में उसकी रति को
'कामप्राया', अर्थात् 'गोपीप्रेम जैसी' कहा गया है।