भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
शिशुपाल सदा श्रीकृष्ण के लिए द्वेषभाव से भरा रहा। तथा राजा यदु के
वंशज कुलसम्बन्ध के कारण उन्हें अपना बान्धव समझते रहे। इन नाना
प्रकार के भक्तों में नाना रूपों में श्रीकृष्ण के लिए सहज राग रहता है
और उन्हें जीवन का वही अभिलाषित लक्ष्य प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण में गोपियों का काम और यदुवंशियों का स्नेह दोनों रागा-
नुगा हैं। श्रीकृष्ण से कंस के भय और शिशुपाल के द्वेष को भक्ति में नहीं
गिना जाता, क्योंकि उनका भाव अनुकूल नहीं है। भक्ति अनुकूलभाव से
ही होती है। अतः श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार भय आदि प्रतिकूल
आकर्षण भक्ति के अंतर्गत नहीं आते। फिर वे यादवों के स्नेह की मीमांसा
करते हैं। यदि वह सख्य के स्तर पर है तो रागानुगा है और यदि विधि
के स्तर पर है तो रागानुगा भक्ति के अन्तर्गत नहीं आयेगा। रागानुगा-
भक्ति के स्तर पर ही सख्य को शुद्ध भक्ति की श्रेणी में गिना जाता है।
यह समझने में कुछ कठिनाई हो सकती है कि गोपियों और कंस
दोनों को एक ही लक्ष्य की प्राप्ति हुई, क्योंकि कंस, शिशुपाल आदि का
भाव गोपीजनों से भिन्न था। अतः इस बात का भलीभाँति विवेचना
करना आवश्यक है। यद्यपि उपरोक्त सब उदाहरणों में केन्द्र श्रीकृष्ण ही
हैं और अनुकूल-प्रतिकूल सब को वैकुण्ठ-जगत् की प्राप्ति होती है, फिर
भी दोनों प्रकार के जीवों में भेद रहता है। श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध
में उल्लेख है कि परतत्त्व एक (अद्वय) है; वही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्
इन तीन प्रकारों से प्रकट है। यहाँ अप्राकृत भेद है। यद्यपि ब्रह्म, परमात्मा
और भगवान् एक ही परतत्त्व हैं, पर कंस, शिशुपाल जैसे भक्तों को ब्रह्म-
ज्योति की ही प्राप्ति हुई, वे परमात्मा अथवा भगवान् को प्राप्त नहीं कर
सके। यही भेद है।
इस सन्दर्भ में सूर्यमण्डल और सूर्यज्योति की उपमा दी जा सकती
है। सूर्यज्योति में रहने का यह अर्थ नहीं कि सूर्यमण्डल में भी प्रवेश हो
गया है। सूर्यमण्डल का तो ताप भी सूर्यज्योति के बराबर नहीं होता।
यदि किसी ने अन्तरिक्षयान से सूर्यज्योति में विचरण किया है तो इसका
यह अर्थ नहीं कि वह सूर्यमण्डल में भी हो आया है। सूर्यज्योति और सूर्य-
मण्डल एकतत्त्व होने पर भी भिन्न हैं- एक शक्ति है तो दूसरा शक्तिमान्
है। इसी प्रकार परतत्त्व श्रीकृष्ण और उनकी अंगकांति ब्रह्मज्योति में
भी भेद-अभेद है। कंस और शिशुपाल को ब्रह्मप्राप्ति हुई, पर गोलोक वृन्दा-
वन धाम में उनका प्रवेश नहीं हो सका। निर्विशेषवादियों और भगवान्
के द्वेषियों का भगवान् में एक प्रकार का आकर्षण होता है; इस कारण