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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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१०४] भक्तिरसामृतसिन्धु
नाना व्यंजनों का भोग लगता। इस प्रकार वे निरन्तर पूर्णरूपेण कृष्ण-
भावना के परायण थे।'' इस सम्पूर्ण विवरण का भाव यह है कि हमें महा-
भागवतों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। यदि कोई भक्ति
के सब साधनों को न कर सके तो कम से कम एक तो अवश्य ही करे,
जैसे पूर्वाचार्यों के उदाहरण से प्रत्यक्ष है। यदि अम्बरीष महाराज के समान
भक्ति के सब साधन किए जायें तो फिर इन सभी के द्वारा भक्तियोग की
सिद्धि निश्चित है। पूर्ण रूप से भक्ति के परायण होते ही विषयों से
निवृत्ति हो जाती है और मुक्ति भक्त की अनुचरी बन जाती है। बिल्व-
मंगल ठाकुर इसके प्रमाण हैं। भगवान् में अनन्य भक्ति होने पर मुक्ति
सेविका के समान भक्त के पीछे-पीछे चला करती है।
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि वैधीभक्ति को आचार्यगण ऐश्वर्य
(मर्यादा) का मार्ग भी कहते हैं।