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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 380 में से

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६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
निराकरण किया है। उन्होंने रामानन्द राय द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमधर्म
की महिमा को अस्वीकार कर दिया। वे कहते हैं कि वर्ण और आश्रम का
यह आचरण केवल बाह्य है। इससे ऊँचा सिद्धान्त भी है। भगवद्गीता में
श्रीकृष्ण ने स्वयं अन्य सब साधनों को त्याग कर कृष्णभावना का पथ
अंगीकार करने के लिए जीव का आह्वान किया है। जीवन की परम
संसिद्धि का एकमात्र यही मार्ग है।
श्रीमद्भागवत (११.२०.६) में भी भगवान् कहते हैं, "वर्ण और
आश्रम के कर्तव्यों का पालन तभी तक करे, जब तक मेरी लीला कथा में
राग और आसक्ति नहीं हो जाती।" भाव यह है कि वर्णाश्रमधर्मरूपी
कर्मकाण्ड अर्थ, इन्द्रियतृप्ति और मोक्ष के लिए है। ये सब उनके लिए हैं,
जो कृष्णभावनाभावित नहीं हुए हैं। वास्तव में शास्त्रों में इन सब क्रियाओं
का विधान जीव को कृष्णभावना तक लाने के लिए ही है। जिसे श्रीकृष्ण
के लिए रागानुगा आसक्ति हो गयी है, उसे शास्त्रविहित कर्तव्यों से
प्रयोजन नहीं रहता।