भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३
भक्ति के पाँच शक्तिशाली साधन
श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि मथुरावास, मूर्ति-अर्चन,
श्रीमद्भागवत का आस्वादन, भक्तसेवन तथा हरेकृष्ण महामन्त्र का
कीर्तन से भक्ति के ये पाँच साधन इतने शक्तिशाली हैं कि इनमें से किसी
एक से तनिक सा सम्बन्ध भी कनिष्ठ भक्त तक में भक्तिभाव को
उद्भावित कर देता है ।
श्रीमूर्त्ति-अर्चन के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी लिखते हैं—"हे सखे !
यदि तुम्हें प्राकृत-जगत् में अपने बन्धु-बान्धवों की कुछ भी इच्छा है तो
केशीघाट के समीप मुस्कराते हुए त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े, तिरछी और
दूर तक फैली हुई दृष्टि वाले, अधर पर वेणुवादन करते हुए और मोरपिच्छ
के साथ चन्द्रके से चमकते हुए गोविन्द नामक कृष्णरूप को मत देखना ।"
इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि यदि कोई घर में अर्चना करता
हुआ श्रीमूर्त्ति के अनुरक्त हो गया तो तथाकथित घर, परिवार और
समाज की सुध-बुध भूल कर उनकी भक्ति में ही डूब जायगा । प्रत्येक
गृहस्थ का प्रधान कर्तव्य है कि घर में कृष्णमूर्ति स्थापित करके अपने सब
बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी आराधना करे । इससे सब क्लब, सिनेमा,
नृत्य आदि में जाने और धूम्रपान, मद्यपान जैसे अनर्थों से बच जायेंगे ।
घर में मूर्ति-अर्चना पर बल देने से इन सब अनर्थों को दूर किया जा
सकता है ।
रूप गोस्वामी आगे लिखते हैं—"हे मूर्ख सखे ! जान पड़ता है कि
तुम श्रीमद्भागवत की पावन पद्यावली का कुछ-कुछ श्रवण कर चुके हो,
जिसमें सकामधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब का निरादर है । अब क्रमशः
भगवल्लीलामय दसवें स्कन्ध के श्लोक तुम्हारे कर्णविवरों में प्रविष्ट होकर
हृदय में अमृत का संचार करेंगे ।"
श्रीमद्भागवत के उपक्रम में ही कहा गया है कि जब तक कोई