सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

श्रवण-स्मरण की कला [ ७६
हृदय से, वाणी से और शरीर से निरन्तर आपको प्रणाम करता रहता है,
वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।"
श्रीमद्भागवत का यह वाक्य सब भक्तों का मार्गदर्शक है। भक्त
को अपने पूर्वपापों के दुःख से तुरन्त मुक्त होने की आशा नहीं करनी
चाहिए। कोई भी बद्धजीव इस कर्मभोग से मुक्त नहीं है, क्योंकि पूर्वकर्मों
से निरन्तर सुख-दुःख की प्राप्ति का नाम ही संसार है। यदि कोई प्राकृत
क्रियाओं से विरत हो गया है तो उसका फिर जन्म नहीं होगा। यह तभी
सम्भव है कि जब वह कृष्णभावनाभावित कर्म के परायण हो जाय, क्योंकि
ऐसे कर्मों का फल नहीं होता। अतः कृष्णभावनाभावित क्रियाओं में सिद्ध
होते ही जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है। ऐसा पुरुष फिर प्राकृत-
जगत् में जन्म नहीं लेगा। इसलिए जो भक्त कर्मफल से पूर्णतः मुक्त नहीं
हुआ है, वह गम्भीरता से कृष्णभावनाभावित कर्म करता रहे, मार्ग में कितने
ही व्यवधान क्यों न आयें। किसी बाधा की स्थिति में वह केवल श्रीकृष्ण
का चिन्तन-स्मरण करता हुआ उनकी कृपा की बाट देखता रहे। यही
उसका अवलम्बन है। यदि भक्त इस भाव से दिन बिताता है तो उसका
वैकुण्ठगमन निश्चित समझना चाहिए। इन क्रियाओं के द्वारा वह भगवद्धाम
में प्रविष्ट होने का दायभाक् अधिकार पा जाता है। दायभाक् पैतृक
सम्पत्ति में पुत्र के कानूनी अधिकार को कहते हैं। इसी प्रकार शुद्धभक्त,
जो अपने कृष्णभावना सम्बन्धी कर्तव्य के निर्वाह में सब प्रकार के कष्ट
सहने को सन्नद्ध रहता है, भगवद्धाम का योग्य अधिकारी हो जाता है।
स्मृति
जिस किसी प्रकार से यदि कोई चित्त में श्रीकृष्ण से अपने नित्य
सम्बन्ध को बसा लेता है तो इस का नाम स्मृति है। स्मृति के विषय में
विष्णुपुराण का एक सुन्दर वाक्य है, "जिन भगवान् के स्मरणमात्र से
सम्पूर्ण जीव समग्र कल्याण के भाजन बन जाते हैं, मैं उन्हीं अजन्मा और
नित्य परम पुरुष की शरण हूँ।" पद्मपुराण में इसी स्मृति की विवेचना
है—"मृत्युकाल में अथवा जीवनकाल में जिनके नाम का स्मरण करने से
मनुष्यों के पापपुंज तत्काल भस्म हो जाते हैं, उन चित्स्वरूप भगवान्
श्रीकृष्ण को नमस्कार है।"
ध्यान
मन से भगवान् के रूप, चिद्गुण, क्रीड़ा, सेवा, आदि का चिन्तन