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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 380 में से

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पृष्ठ 104

अध्याय १०
श्रवण-स्मरण की कला
श्रवण
कृष्णभावना और भक्तियोग का आरम्भ श्रवण से होता है। सभी
मनुष्यों को यह अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भक्तिगोष्ठी में आकर
श्रवण करें। कृष्णभावना के पथ पर उन्नति के लिए यह परम अनिवार्य
है। जब कोई शब्दब्रह्म को सुनने में कर्णविवरों का योग करता है तो वह
शीघ्र ही हृदय से शुद्ध और परिष्कृत हो जाता है। भगवान् श्रीचैतन्य
महाप्रभु ने श्रवण के माहात्म्य पर बड़ा बल दिया है। यह बद्धजीव के हृदय
को पवित्र कर देता है, जिससे वह द्रुतगति से भक्तियोग में लगने और
कृष्णभावना को समझने का अधिकारी बन जाता है।
'गरुडपुराण' श्रवण की महिमा का अतिशय सुन्दर दिग्दर्शन है,
"प्राकृत जगत् में बद्धजीव की अवस्था सर्प से कटे अचेतन मनुष्य जैसी
है, क्योंकि इन दोनों को ही मन्त्रध्वनि से फिर चेतन किया जा सकता
है।" सर्प द्वारा दष्ट मनुष्य तुरन्त नहीं मरता, वरन् पहले अचेतन होकर
कुछ समय उसी अवस्था में पड़ा रहता है। प्राकृत-जगत् में जीव निद्रा-
मग्न है, क्योंकि वह अपने यथार्थ स्वरूप और कर्तव्य को तथा श्रीभगवान्
से अपने सम्बन्ध को नहीं जानता। अतः विषयी जीवन का अर्थ है कि माया-
रूपी सर्प का काटना और इस प्रकार कृष्णभावना के अभाव में जीव का
मृतप्राय हो जाना। सर्प से कटे हुए मुमूर्षु को मन्त्रोच्चारण से फिर जीवन-
दान किया जा सकता है। इस मन्त्रविद्या के अनेक विशारद हैं। इसी प्रकार
महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम
राम हरे हरे को सुनाकर मृयमाण अचेतन पुरुष को वापस कृष्णभावना की
अवस्था में लाया जा सकता है।
श्रीमद्भागवत (४.२६.४०) में भगवच्चरित-श्रवण की महिमा के
सम्बन्ध में शुकदेव गोस्वामी महाराज परिक्षित से कहते हैं, "हे राजन !
वही स्थान निवास के योग्य है जहाँ महान् आचार्य भगवान् के दिव्य चरित