भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
क्षुन्नाशो बहुमूत्रत्वं स्तब्धता बलवान् ज्वरः ।
आमज्वरस्य लिङ्गानि न दद्यात्तत्र भेषजम् ॥ १९ ॥
भेषजं ह्यामदोषस्य भूयो ज्वलयति ज्वरम् ।
मृदौ ज्वरे लघौ देहे प्रचलेषु मलेषु च ।
पक्वं दोषं विजानीयाज्ज्वरे देयं तदौषधम् ॥ १२० ॥
मुखसे लारका गिरना, उबकाई आना, हृदयपर बोझसा मालूम होना, अरुचि, तंद्रा, आलस्य, भोजनका न पचना, मुखमें विरसता, शरीरमें भारीपन मालूम होना, भूख न लगना, मूत्रकी अधिकता, शरीरमें जडता और ज्वरकी प्रबलता ये सब आमज्वरके लक्षण हैं। इन लक्षणोंसे युक्त आमज्वरमें औषधिका प्रयोग नहीं करना चाहिये। कारण, आमज्वरमें आमरसका परिपाक न होनेपर औषधि प्रयोग करनेसे ज्वरका वेग और भी बढ़जाता है और आमदोषके पच जानेपर ज्वरकी कमी, शरीरमें लघुता, वात-पित्त और कफकी समता और मल-मूत्रादिकी प्रवृत्ति इन सब लक्षणोंके प्रकट होनेपर औषध देनी चाहिये ॥ १८-१२० ॥
कषायादि ओषधियोंके सेवनका निषेध।
पीताम्बुर्लङ्घितः क्षीणोऽजीर्णी भुक्तः पिपासितः ।
न पिबेदौषधं जन्तुः संशोधन मथेतरत् ॥ २१ ॥
जलपान करनेके पश्चात्, उपवासके अन्तमें, क्षीणावस्थामें, अजीर्ण रोगमें भोजन करनेके पश्चात् और प्यासके समय मनुष्यको संशोधन (वमन, विरेचन आदि) अथवा किसी प्रकारकी ओषधि सेवन नहीं करनी चाहिये ॥ २१ ॥
अभुक्त अवस्थामें औषधसेवनके गुण ।
वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं
हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव ।
तद्बालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतं
ग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयं च ॥ २२ ॥
शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हिंस्या-
दन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरेति ।