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सर्वकोश
बौधायन शुल्बसूत्रम् (आचार्य बौधायन - प्राचीन वैदिक रेखागणित, ज्यामिति एवं वेदी-निर्माण सटीक)

बौधायन शुल्बसूत्रम् (आचार्य बौधायन - प्राचीन वैदिक रेखागणित, ज्यामिति एवं वेदी-निर्माण सटीक)

Baudhayana Shulbasutram with Commentary by Vibhutibhushan Bhattacharya

आचार्य बौधायन (सम्पादक: विभूतिभूषण भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished366 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 366 में से

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पृष्ठ 31

ऽध्यायः ] बौधायनीयं ३
चिनुते १५। अथ प्राजापत्यामुपदधाति १६। अथापस्या उपदधाति १७।
अथैताः पञ्चस्कन्ध्याः प्राचीरायातयति १८। अथाश्विनीरुपदधाति "ध्रुव-
क्षितिर्ध्रुवयोनिरि"ति पञ्च १९। अथ वालखिल्या उपदधाति २०।
अथाक्ष्णया स्तोमीया उपदधाति २१। अथासपन्ना उपदधाति २२। अथ
द्वाभ्यां शताभ्यां प्रोक्षति। अथाग्निमभिमृशति अग्निरसि वैश्वानरोऽसी-
त्यादिभिः प्रतिपादितम्। तथा च कथमिह प्रतिज्ञा "अथेमे अग्निचया"
इति चेत् ?
सत्यम्; तथाप्यत्र चयशब्देन कल्पसूत्रप्रतिपाद्यमान-मन्त्रकरणके-
ष्टकासाधनक्रमविशेषस्थण्डिलनिर्वृत्त्यौपयिकव्यापारात्मकचयनोपयुक्तक्षेत्र-
विशेषोपधेयेष्टकाकरणश्येनाद्याकारपरिज्ञानोपायभूतो व्यापारो विवक्षितः।
स चेहैव व्युत्पाद्यते नान्यत्रेति युक्तैव प्रतिज्ञा।
ननूक्तरीत्या चयनशब्दोपपत्तिः। तथापि ज्वलनवाचिनोऽग्निशब्दस्य
कथं श्येनाद्याकारविशिष्टस्थण्डिलविशेषपरत्वमिति चेत्, उच्यते—यद्यपि
ज्वलनरूढोऽग्निशब्दः तथापि अग्निसंस्कारचयननिवृत्ते अग्न्याधारस्थ-
ण्डिलेऽपि लक्षणया अग्निशब्दः प्रयुज्यते। अत एव नवमे २३ अग्निशब्दस्य
स्थण्डिलविशेषपरत्वमभ्युपगम्य विचारितम्। तथा हि "हिरण्यशकलै-
रग्निं प्रोक्षतीति २४" श्रूयते।

१५. बौ. श्रौ. सू. (प्र. १०।४०; पृ. ४९)
१६. ,, ,, ,, (प्र. १०।३६; पृ. ३४)
१७. ,, ,, ,, (प्र. १०।३५; पृ. ३२)
१८. ,, ,, ,, (प्र. १०।३८; पृ. ३५)
१९. ,, ,, ,, (प्र. १०।३८; पृ. ३५) तै. सं. ४.३.४.१-५
२०. ,, ,, ,, (प्र. १०।४०; पृ. ३६)
२१. ,, ,, ,, (प्र. १०।४२; पृ. ४०)
२२. ,, ,, ,, (प्र. १०।५५; पृ. ४२)
२३. पू. मी. ६.१.७।
२४. बौ. श्रौ. सू. (प्र० १०।४७)