सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 5, कुल 235 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 5

२

है। क्योंकि उसमें मोक्ष की अपेक्षा मात्र स्वभाव, आसु, पुरुष, रोग आदि सृष्टि विज्ञान संबंधी विषयों पर अधिक विचार किया जाता है। और इस पर से यह भी सिद्ध होता है कि अन्य दर्शनों की अपेक्षा आयुर्वेद दर्शन अधिक प्रश्चीन है। अन्य दर्शनों का प्रचार इसके बाद हुआ; वे अध्यात्म प्रधान हैं; उनका एक मात्र साध्य मोक्ष है और सृष्टि विज्ञान पर वे उत्तम ही विचार करते हैं जितना कि उनके बुद्धि-वाद के लिये आवश्यक है। हम तो यह भी कहने के लिये प्रस्तुत हैं कि भारतीय आर्य सृष्टिविज्ञान की दृष्टि से आयुर्वेद सम्मत सृष्टिविज्ञान ही स्वीकार करने योग्य है।

उपनिषदों में भी कुछ अध्यात्म प्रधान हैं तो कुछ सृष्टिविज्ञान प्रधान। सृष्टिविज्ञान प्रधान उपनिषद् अधिक प्राचीन हैं। प्रजापति-वाद और पुरुष सूक्त, सृष्टिविज्ञानप्रधान उपनिषद् ही हैं जिनका कि वेदों में उल्लेख है। इनके अतिरिक्त तीन उपनिषदों का आयुर्वेद में उल्लेख है। इनको वातकलाकलीय, आत्रेयभद्रकाप्यीय और यजुः पुरुषीय कहते हैं। इन परिषदों पर से ही आयुर्वेद दर्शन का समुचित ज्ञान हो सकता है अतः इन पर अधिक विचार करना आवश्यक है।

चरक संहितांतर्गत उक्त परिषदों के काल निर्णय के लिये यह ध्यान में रखना चाहिये कि इनका अयोजन पुनर्वसु आत्रेय के समय में और उनकी अध्यक्षता में हुआ। पुनर्वसु आत्रेय, अग्निवेश के गुरु थे और अग्निवेश के आश्रम में द्रोणाचार्य ने अध्ययन किया। पुनर्वसु, कृष्णार्त्रेय के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। व्यास ने इनको इसी नाम से संबोधित किया है। और इन परिषदों के समय वाल्हीक देश वैदिक संस्कारों से संस्कृत था।