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सर्वकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 235 में से

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युनवैसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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रस से गर्भोत्पादक द्रव्यों की उत्पत्ति और वृद्धि होती है; गर्भस्थ प्राणों का समुचित संबंध होता है और वृत्ति-पुष्ट्यादि भाव पैदा होते हैं।

सत्त्व भी संबंध विधायक अर्थात् औपपादक है। यह स्पर्शनेन्द्रिय के द्वारा (क्योंकि स्पर्शनेन्द्रिय में सत्त्व का संचार रहता है,) जीव और शरीर में संबंध प्रस्थापित करता है। जब (मरण के समय) यह स्पर्शनेन्द्रिय से बाहर जाने को उद्यत होता है तब प्राणी का स्वभाव बदल जाता है; अभिरूचि का विपर्यास होता है; इंद्रिय उपतप्त होते हैं; बलक्षय होता है और रोग, अत्यधिक कुश कर देते हैं। जब यह शरीर को छोड़ देता है तब प्राण भी शरीर को त्याग देते हैं। इंद्रियों को अपने २ विषयों के ग्रहण में प्रवृत्त करनेवाले को ही 'मन' कहते हैं। वह तीन प्रकार का है शुद्ध, राजस् और तामस्। इस जन्म में इन गुणों में से जो गुण अधिक रहता है उसी का अगले जन्म में संबंध रहता है यदि इस जन्म में मन शुद्ध हो, तो उसे गत जन्मों का स्मरण होता है। यह स्मृतिजन्य ज्ञान, आत्मा में रहता है और उसीसे प्राप्त होता है। मन का उसके साथ अनुबंध रहता ही है। ऐसी अवस्था में यदि मन शुद्ध हो तो उसकी वृत्तियाँ, आत्मा के स्मार्त ज्ञान में परिणत होती हैं और इसी हेतु से पुरुष को 'जातिस्मर' कहा