सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 235 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

कौशिकका परंपरावाद

१०३

कि “ यदि च मनुष्यो मनुष्य प्रभवः, कस्मात् जडांधकुञ्ज-
मूकवासनमिन्मिण व्यंगोन्मत्तकुण्डिकिलासिन्धो जाताः पितृ-
सदृशरूपा न भवति ? ” किंतु भारद्वाज के इस कथन से
परंपरावाद पर कुछ प्रकाश नहीं पड़ता। आत्मवादियों ने
इतके मत को उद्घृत करते हुए यह कहा है कि “ मातापितृ
परंपरा से पैदा होने वाले पुरुषों में यद्यपि सारूष्य रहता है
और इस कारण उनको पूर्व सदृश भी कहा जाता है तथापि
वे पूर्व के नहीं हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश प्रतिसमय नवीन
नवीन होती है। सारांश प्रत्येक प्राणी आत्मतत्त्वरहित पंच-
विकारसमुदायमात्र होने के कारण और इस समुदाय का
परिणाम ही ‘ सत्त्व ’ होने के कारण चेतना धातुपुरुष, न
कुछ करता, न कुछ भोगता और न अस्तित्व ही रखता है”।
किंतु यह मत भी कौशिक के परंपरावाद से मेल नहीं खाता।
कर्मधादियों ने मातापितृ वाद का खंडन करत हुए यह कहा
है कि “ इस तरह जिनकी बुद्धि है उनके मत से चतुर्विधा
योनि है ही नहीं ! ” अर्थात् पितृ परंपरावादियों का सिद्धांत
औद्भिज और स्वेदज योनियों में जिनमें कि मातापितृसंबंध
का अभाव है, चरितार्थ नहीं होता। किंतु इस पर से भी
कौशिक के परंपरावाद पर पर्याप्त प्रकाश नहीं पड़ता।

आस्तिकों में भी ‘ बुद्धिपूर्वकसर्ग ’ के नाम से एक
परंपरावाद प्रचलित है जिसमें ब्रह्मा से मन्वादिकों की,