अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ें(४)
पराच एनान् प्र णुद कण्वान् जीवितयोपनान्.
तमांसि यत्र गच्छन्ति तत् क्रव्यादो अजीगमम्.. (५)
हे पृश्निपर्णी! प्राणों का नाश करने वाले एवं कोढ़ आदि रोगों को उत्पन्न करने वाले
कण्व नामक पापों को पीछे की ओर जाने को विवश कर. मैं भी कुष्ठ आदि रोगों को वहां
भेजता हूं, जहां सूर्योदय के बाद अंधकार चला जाता है. (५)
सूक्त-२६ देवता—पशुगण
एह यन्तु पशवो ये परेयुर्वायुर्येषां सहचारं जुजोष.
त्वष्टा येषां रूपधेयानि वेदास्मिन् तान् गोष्ठे सविता नि यच्छतु.. (१)
जो पशु कभी न लौटने के लिए चले गए हैं, वे मेरी इस गोशाला में आ जाएं. वायु जिन
की रक्षा के लिए साथ चलती है एवं त्वष्टा जिन के गर्भाशय के बछड़ों का रूप जानते हैं, उन
समस्त पशुओं को सविता देव इस गोशाला में इस प्रकार स्थापित करें कि वे कभी न भागें.
(१)
इमं गोष्ठं पशवः सं स्रवन्तु बृहस्पतिरा नयतु प्रजानन्.
सिनीवाली नयत्वाग्रमेशामाजग्मुषो अनुमते नि यच्छ.. (२)
गाय आदि पशु मेरी इस गोशाला में आएं. उन्हें यहां लाने का ढंग जानते हुए बृहस्पति
देव उन्हें यहां लाएं. हे सिनीवाली अर्थात् पूर्णिमा और अमावस्या की देवियो! तुम इन पशुओं
के पीछे चलती हो. तुम गोशाला में आए हुए इन पशुओं को रोको. (२)
सं सं स्रवन्तु पशवः समाश्वाः समु पूरुषाः.
सं धान्यस्य या स्फातिः संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (३)
गाय आदि पशु, घोड़े, सेवक आदि पुरुष तथा गेहूं, जौ आदि अन्नों की वृद्धि मेरे पास
आए. इस के निमित्त मैं घृत से हवन करता हूं. (३)
सं सिञ्चामि गवां क्षीरं समाज्येन बलं रसम्.
संसिक्ता अस्माकं वीरा ध्रुवा गावो मयि गोपतौ.. (४)
मैं पहली बार बच्चा देने वाली गाय के ताजा दूध में घी मिलाता हूं तथा घी में शक्ति देने
वाला अन्न और जल मिलाता हूं. मेरे पुत्र, पौत्र आदि घी से शरीर चुपड़ कर दृढ़ गात्र वाले
बनें. इस के निमित्त मुझ गोस्वामी के पास गाएं स्थित रहें. (४)
आ हरामि गवां क्षीरमाहार्षं धान्यं १ रसम्.
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