सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 850, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 850

ये देवानामृत्विजो यज्ञियासो मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः.
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
देवताओं के ऋत्विज्, यज्ञकर्ता, मनु के पुत्र अर्थात् मनुष्य, अमृतत्व को प्राप्त तथा
सत्यनिष्ठ देवता हैं, वे आज हमें अधिक यज्ञ प्रदान करें. हे देवताओ! तुम कल्याणकारी रक्षा
साधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (५)
तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्.
अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय.. (६)
हे मित्र और वरुण! हमें कहा जाता हुआ फल प्राप्त हो. भयों एवं रोगों से रक्षा करने
वाला प्रशंसनीय फल हमें प्राप्त हो. हम धन लाभ और प्रतिष्ठा का अनुभव करें. विशाल एवं
सभी देवों के निवासस्थान द्युलोक को नमस्कार है. (६)
सूक्त-१२ देवता—उषा
उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता.
अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (१)
उषा आते ही अपनी बहन रात्रि के अंधकार को दूर कर देती है. इस के पश्चात उषा
लौकिक और वैदिक मार्ग को पूर्ण रूप से खोलती है. इस उषा के द्वारा हम देवों द्वारा भली
प्रकार दिए हुए एवं हितकारी अन्न को प्राप्त करें. कर्म करने में कुशल पुत्र एवं पौत्र वाले हम
सौ वर्षों तक प्रसन्न हों. (१)
सूक्त-१३ देवता—इंद्र
इन्द्रस्य बाहू स्थविरौ वृषाणौ चित्रा इमा वृषभौ पारयिष्णू.
तौ योक्षे प्रथमो योग आगते याभ्यां जितमसुराणां स्वर्ह्यत्.. (१)
इंद्र की भुजाएं देवों से वैर करने वाले राक्षसों पर विजय प्राप्त करने वाली, स्थूल तथा
अभिमत फल देने वाली हैं. मैं अपने कल्याण के लिए इन भुजाओं का पूजन करता हूं. ये
भुजाएं सब के द्वारा प्रशंसनीय, सांडों के समान सबल तथा शत्रुओं का हनन करने में समर्थ
हैं. परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र की दोनों भुजाएं सभी उपासकों के लिए पूर्व निश्चित है. मैं अप्राप्त
की प्राप्ति अर्थात् योग और प्राप्त के रक्षण अर्थात् क्षेम के लिए इन की पूजा करता हूं. इन
भुजाओं ने स्वर्ग के निवासी देवों को बाधा पहुंचाने वाली सेना को पराजित किया है. (१)
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्.
संक्रन्दनो ऽ निमिष एकवीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः.. (२)
eBook converter DEMO Watermarks*