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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 816, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 816

देवों में व्याप्त होने वाले, सात परिक्रमा करने वालों के द्वारा किए हुए यज्ञों को जानते
हुए, अर्चनीय स्तुति करने वाले जो पितर प्यासे हैं, देवों को प्रणाम करने वाले, उन देवों के
साथ तथा सत्य फल एवं क्रांतदर्शी ऋषियों के साथ सोमयाग में बैठने वाले हे अग्नि! हमारे
लिए अपरिमित धन ले कर आओ. (४७)
ये सत्यासो हविर्दो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं तुरेण.
आग्ने याहि सुविद्वत्रेभिरर्वाङ् परैः पूर्वैर्ऋषिभिर्घर्मसद्भिः.. (४८)
जो पितर सत्य का भाषण करने वाले, चरु, पुरोडाश आदि हवियों का भक्षण करने
वाले, सोमरस का पान करने वाले इंद्र तथा अन्य देवों के साथ एक रथ पर बैठे हुए हैं. उन
शोभन धनों वाले एवं उत्कृष्ट पूर्व पुरुषों के साथ यज्ञ में बैठने वाले हे अग्नि! तुम शीघ्र हमारे
सामने आओ. (४८)
उप सर्प मातरं भूमिमेतामुरुव्यचसं पृथिवीं सुशेवाम्.
ऊर्णम्रदाः पृथिवी दक्षिणावत एषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.. (४९)
हे प्रेत! विस्तीर्ण व्याप्ति वाली, सुख देने वाली माता भूमि के समीप आओ. यह पृथ्‍वी
यज्ञ संबंधी बहुत सी दक्षिणाओं से युक्त तुम्हारे लिए ऊनों से बने हुए कंबल प्रदान करने वाली
एवं सुखकारी हो कर पूर्व दिशा के निमित्त मार्गों में तुम्हारी रक्षा करे. (४९)
उच्छ्वञ्चस्व पृथिवि मा नि बाधथाः सूपायनास्मै भव सूपसर्पणा.
माता पुत्रं यथा सिचाभ्येनं भूम ऊर्णुहि.. (५०)
हे भू देवता! तुम पुलकित हो जाओ और अपने समीप आए हुए पुरुष को बाधा मत दो.
अपितु इस पुरुष के सुख से प्राप्त होने वाली बनो. माता जिस प्रकार अपने पुत्र को आंचल से
ढकती है, उसी प्रकार अपने पास आए इस पुरुष को चारों ओर से ढक लो. इस से इसे शीत,
उष्ण आदि दुःख नहीं होंगे. (५०)
उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम्.
ते गृहासो घृतश्चुतः स्योना विश्वाहास्मै शरणाः सन्वत्र.. (५१)
पुलिकत पृथ्‍वी सुखपूर्वक स्थिर रहे. श्मशान में उगी हुई हजारों ओषधियां अर्थात्
जड़ीबूटियां तुम्हारे आश्रित हों, तुम्हारे लिए ही टपकाने वाली हों. इस मृत पुरुष के लिए सभी
दान सुख देने वाली पृथ्‍वी को गृह निर्माण के लिए धारण करते हैं. वे श्मशान देश में रक्षक
बनें. (५१)
उत्ते स्तभ्नामि पृथिवीं त्वत् परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्.
एतां स्थूणां पितरो धारयन्ति ते तत्र यमः सादना ते कृणोतु.. (५२)
हे मृत पुरुष! तेरे लिए मैं इस पृथ्वी को ऊंची बनाता हूं. तेरे चारों ओर सभी प्राणियों से
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