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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 784, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 784

हे आदित्य अर्थात् अदिति पुत्र सूर्य! तुम रथ के लक्षणों वाली नाव पर सवार हो. वह
नाव सौ डांडों वाली है. उस नाव पर तुम्हारे चढ़ने का प्रयोजन सभी का कल्याण है. इस
प्रकार की नाव पर आरूढ़ तुम मुझे अनेक आध्यात्मिक, अधिभौतिक तथा अधिदैविक
विविध बाधाओं से पार कर के रात्रि और दिन के मध्य मार्गों के पार पहुंचाओ. (२५)
सूर्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये.
रात्रिं मात्मपीपरो ऽ हः सत्राति पारय.. (२६)
सूर्य देव सब के कल्याण के लिए सौ डांडों वाली नाव पर सवार होते हैं. यह नाव रथ के
लक्षणों वाली है. हे सूर्य! रात्रि में मुझे कोई बाधा न पहुंचाए तथा दिन के तीनों सत्रों अर्थात्
प्रातः, मध्याह्न और संध्या से मुझे पार करो. (२६)
प्रजापतेरावृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च.
जरदष्टिः कृतवीर्यो विहायाः सहस्रायुः सुकृतश्रयेयम्.. (२७)
वर्षा आदि के द्वारा प्रजाओं का पालन करने से सूर्य प्रजापति हैं. मैं प्रजापति सूर्य के
कवच से तथा कश्यप ऋषि की ज्योति और तेज से घिरा हुआ हूं, सुरक्षित हूं. मैं जीर्ण अर्थात्
वृद्ध हो कर भी दृढ़ अंगों वाला हूं तथा अनेक प्रकार के भोगों को भोगता हूं. मैं दीर्घ आयु
प्राप्त करता हुआ तथा लौकिक और वेदों का कार्य करता हुआ सूर्य देव की कृपा का पात्र
रहूं. (२७)
परीवृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च.
मा मा प्रापन्निषवो दैव्य या मा मानुषीरवसृष्टा वधाय.. (२८)
मैं कश्यप रूपी सूर्य के मंत्र रूपी कवच से ढका हुआ हूं तथा सत्य और रक्षा करने
वाली किरणों से आच्छादित हूं. इसलिए मनुष्य और देवता मेरी हिंसा करने के लिए जिन
आयुधों का प्रयोग करते हैं, वे मुझे प्रभावित नहीं कर सकेंगे. (२८)
ऋतेन गुप्त ऋतुभिश्च सर्वैभूतेन गुप्तो भव्येन चाहम्.
मा मा प्राप्त पाप्मा मोत मृत्युरन्तर्दधे ऽ हं सलिलेन वाचः.. (२९)
सत्य, सूर्यरूपी ब्रह्म और सभी ऋतुएं मेरी रक्षा कर रही हैं. इस कारण पाप मेरे समीप
नहीं आ सकता जो नरक में निवास का कारण बनता है, मैं उसी प्रकार अदृश्य रहता हूं, जिस
प्रकार अभिमंत्रित जल में छिपे प्राणी किसी को दिखाई नहीं देते. मैं पापों से सुरक्षित होने के
लिए अपनेआप को अभिमंत्रित और पवित्र करता हूं. (२९)
अग्निर्मा गोप्ता परि पातु विश्वत उद्यन्सूर्यो नुदतां मृत्युपाशान्.
व्युच्छन्तीरुषसः पर्वता ध्रुवाः सहस्रं प्राणा मय्या यतन्ताम्.. (३०)
अपने आश्रितों के रक्षक अग्नि देव मेरी रक्षा करें. उदय होते हुए सूर्य मृत्यु के पाशों से
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