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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 705

रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (९)
उन्होंने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक लिया है. ये महान इंद्र के द्वारा किरणों से
ढके हुए चले आ रहे हैं. (९)
तस्येमे नव कोशा विष्टम्भा नवधा हिताः.. (१०)
उस के नौ कोष विविध रूप धारण किए हुए हैं. (१०)
स प्रजाभ्यो वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न.. (११)
वे स्थावर और जंगम सभी प्रजाओं के द्रष्टा और सभी के साक्षी हैं. (११)
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव.. (१२)
यह सब उसी को प्राप्त होता है. वह अकेला ही एकवृत है. (१२)
एते अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.. (१३)
सब देवता इस एक का ही वरण करते हैं. (१३)
सूक्त-५ देवता—अध्यात्म
कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च बाह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च
य एतं देवमेकवृतं वेद.. (१)
कीर्ति, यश, आकाश, जल, ब्रह्मवर्चस् अर्थात् ब्रह्म तेज अन्न और अन्न को पचाने की
क्रिया उसे ही प्राप्त होती है, जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है. (१)
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (२)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता द्वितीय, तृतीय चतुर्थ नहीं कहलाता. (२)
न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता पंचम, षष्ठ अथवा सप्तम नहीं कहलाता है. (३)
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (४)
जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है वह अष्टम, नवम नहीं कहलाता है. (४)
स सर्वस्मै वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (५)