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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 582

स्वर्ग में पहुंच सके, वैसा करो. (३०)
बभ्रेरध्वर्यो मुखमेतद् वि मृड्ढ्याज्याय लोकं कृणुहि प्रविद्वान्.
घृतेन गात्रानु सर्वा नि मृड्ढि कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः.. (३१)
हे अध्वर्यु! ऋत्विज् का भरणपोषण करने वाले पके हुए भात का मुंह शुद्ध करो. हे
विद्वान् अध्वर्यु! ओदन में घी डालने के लिए गड्ढा बनाओ. इस के पश्चात बटलोई के भाग के
सभी अंगों को घी से चिकना करो. इस ओदन के द्वारा मैं पूर्वजों के अभिलषित स्वर्ग का मार्ग
बनाऊंगा. (३१)
बभ्रे रक्षः समदमा वपैभ्यो ऽ ब्राह्मणा यतमे त्वोपसीदान्.
पुरीषिणः प्रथमानाः पुरस्तादार्षेयास्ते मा रिषन् प्राशितारः.. (३२)
हे भरणशील ब्रह्मौदन! ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय आदि जो तुझे खाने के लिए बैठें,
उन्हें तू वह पीड़ा पहुंचा जो राक्षस पहुंचाते हैं. पूर्व में जो ऋषि गोत्र एवं प्रवर के ज्ञाता, प्रजा
पशु आदि के पूरक एवं लोक में पुत्र, पौत्र आदि के द्वारा समृद्ध भृगु अंगिरा आदि के मंत्रों को
जानने वाले ब्राह्मण तुझे खाते हैं, वे तुझे खा कर कष्ट प्राप्त न करें. (३२)
आर्षेयेषु नि दध ओदन त्वा नानार्षेयाणामप्यस्त्यत्र.
अग्निर्मे गोप्ता मरुतश्च सर्वे विश्वे देवा अभि रक्षन्तु पक्वम्.. (३३)
हे भात! मैं तुम्हें ऋषि आदि को जानने वाले ब्राह्मणों में धारण करता हूं और इस प्रकार
के ब्राह्मणों को तुम्हें खिलाता हूं. इस ब्रह्मौदन में ऋषि, गोत्र आदि न जानने वाले ब्राह्मणों की
संभावना भी नहीं है. अग्नि देव मेरे रक्षक हैं. सभी अर्थात् उनचास मरुत् एवं विश्वे देव मेरे
द्वारा पकाए हुए भात की रक्षा करें. (३३)
यज्ञं दुहानं सदमित् प्रपीनं पुमांसं धेनुं सदनं रयीणाम्.
प्रजामृतत्वमुत दीर्घमायू रायश्च पोषैरुप त्वा सदेम.. (३४)
यह ब्रह्मौदन यज्ञों को उत्पन्न करने वाला, सदैव बढ़े हुए ऊधस्क अर्थात् एन वाला पुरुष
रूपी धेनु है. हे भात! संपत्तियों के गृह रूप तुझ को खाते हुए हम पुत्र, पौत्र आदि के द्वारा
अमरता, दीर्घ आयु, धन एवं समृद्धि प्राप्त करें. (३४)
वृषभो ऽ सि स्वर्ग ऋषीनार्षेयान् गच्छ.
सुकृतां लोके सीद तत्र नौ संस्कृतम्.. (३५)
हे ब्रह्मौदन! तुम कामनाओं के पूरक एवं स्वर्गलोक में पहुंचाने वाले हो. तुम मंत्र जानने
वाले ऋषियों के पास जाओ. उन के द्वारा खाए जाने पर तुम हमें पुण्य करने वालों के लोक
अर्थात् स्वर्ग में पहुंचाओ. वहां हमारा और तुम्हारा संस्कार होगा. (३५)
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