अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे यह पुरुष अनेक गायों, घोड़ों और प्रजाओं से युक्त हो. (३)
सूक्त-६९ देवता—बृहस्पति
गिरावरागरार्टेषु हिरण्ये गोषु यद् यशः.
सुरायां सिच्यमानायां कीलाले मधु तन्मयि.. (१)
हिमालय पर्वत में जो यश है, रथ में बैठ कर चलने वाले राजाओं में, स्वर्ण में और गायों
में जो यश है, वह मुझे प्राप्त हो. पात्रों में ढाली जाती हुई मदिरा में और अन्न में जो मधुर रस
रूपी यश है, वह मुझे प्राप्त हो. (१)
अश्विना सारघेण मा मधुनाङ्क्तं शुभस्पती.
यथा भर्गस्वतीं वाचमावदानि जनाँ अनु.. (२)
हे सुंदर सूर्या के पति अश्विनीकुमारो! मुझे मधुमक्खियों द्वारा एकत्र किए गए मधु से
सींचो, जिस से मैं मनुष्यों को लक्ष्य कर के, मधुर वाणी बोलूं. (२)
मयि वर्चो अथो यशो ऽ थो यज्ञस्य यत् पयः.
तन्मयि प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृंहतु.. (३)
प्रजापति जिस प्रकार अंतरिक्ष में ज्योतिमंडल को दृढ़ करते हैं, उसी प्रकार मुझ
यजमान में तेज, यश और यज्ञ का फल धारण करें. (३)
सूक्त-७० देवता—संध्या
यथा मांसं यथा सुरा यथाक्षा अधिदेवने.
यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः.
एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (१)
मांसभक्षी को मांस, शराबी को शराब और जुआरी को पासे जिस प्रकार प्रिय होते हैं
तथा जिस प्रकार सुरत चाहने वाले पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा
मन तेरे बछड़े में लगा रहे. (१)
यथा हस्ती हस्तिन्याः पदेन पदमुद्युजे.
यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः.
एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (२)
हाथी जिस प्रकार अपने पैर से प्रेम के साथ हथिनी का पैर मोड़ता है तथा जिस प्रकार
सुरत के इच्छुक पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा मन तेरे बछड़े में
लगा रहे. (२)
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