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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 187

हूं कि वह मुझे पाप से बचाएं. (१)
यथा हव्यं वहसि जातवेदो यथा यज्ञं कल्पयसि प्रजानन्.
एवा देवेभ्यः सुमतिं न आ वह स नो मुञ्चत्वंहसः.. (२)
हे जातवेद अग्नि! तुम जिस प्रकार चरु, पुरोडाश आदि हव्य को देवों तक पहुंचाते हो
तथा जिस प्रकार ज्ञान रखते हुए यज्ञ पूर्ण करते हो, उसी प्रकार हमारे विषय में देवों की उत्तम
बुद्धि को लाओ. इस प्रकार के अग्नि हमें पाप से छुड़ाएं. (२)
यामन्द्यामन्नुपयुक्तं वहिष्ठं कर्मन्कर्मन्नाभागममग्निमीड़े.
रक्षोहणं यज्ञवृधं घृताहुतं स नो मुञ्चत्वंहसः (३)
होम के आधार पर होने के कारण अनेक फल प्राप्त कराने में नियुक्त, ढोने वालों में
श्रेष्ठ, अनेक यज्ञ कर्मों के द्वारा सेवनीय, राक्षसों के विनाश कर्ता, यज्ञों की वृद्धि करने वाले
एवं घृत की आहुतियों से दीप्त अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. इस प्रकार के अग्नि मुझे पाप से
छुड़ाएं. (३)
सुजातं जातवेदसमग्निं वैश्वानरं विभुम्.
हव्यवाहं हवामहे स नो मुञ्चत्वंहसः.. (४)
शोभन जन्म वाले, उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता, संसार के मनुष्यों के हितैषी,
व्यापक एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि का मैं आह्वान करता हूं. वह पाप से मेरी रक्षा करें.
(४)
येन ऋषयो बलमद्योतयन् युजा येनासुराणामयुवन्त मायाः.
येनाग्निना पणीनिन्द्रो जिगाय स नो मुञ्चत्वंहसः.. (५)
ऋषियों ने जिन मित्र बने हुए अग्नि की सहायता से अपना सामर्थ्य बढ़ाया, देवों ने जिन
की सहायता से असुरों की माया को नष्ट किया तथा जिन अग्नि की सहायता से इंद्र ने पणियों
को पराजित किया, वे अग्नि मुझे पाप से बचाए. (५)
येन देवा अमृतमन्वविन्दन् येनौषधीर्मधुमतीरकृण्वन्.
येन देवाः स्व १ राभरन्त्स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६)
जिस अग्नि की सहायता से देवों ने अमृत प्राप्त किया, जिन अग्नि की सहायता से
जड़ीबूटियों ने मधुर रस प्राप्त किया तथा जिन की सहायता से स्वर्ग प्राप्त किया जाता है, वह
अग्नि देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (६)
यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते यज्जातं जनितव्यं च केवलम्.
स्तौम्यग्निं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७)
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