अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं जानन्नग्न आ रोहाधा नो वर्धया रयिम्.. (१)
हे अग्नि देव! यह अरणि अथवा यजमान तेरी उत्पत्ति का कारण बने. जिस से उत्पन्न
हो कर तुम दीप्त होते हो, अपने उस उत्पत्ति कारण को जानते हुए उस में प्रवेश करो. इस के
पश्चात तुम हमारे धन की वृद्धि करो. (१)
अग्ने अच्छा वदेह नः प्रत्यङ् नः सुमना भव.
प्र णो यच्छ विशां पते धनदा असि नस्त्वम्.. (२)
हे अग्नि देव! हमारे सामने हो कर हमें प्राप्त होने वाले फल को प्रिय कहो तथा हमारे
सामने आ कर प्रसन्न मन वाले बनो. हे वैश्वानर रूप से प्रजापालक अग्नि! हमें अपेक्षित धन
प्रदान करो, क्योंकि तुम ही हमारे धनदाता हो. (२)
प्र णो यच्छत्वर्यमा प्र भगः प्र बृहस्पतिः.
प्र देवीः प्रोत सूनृता रयिं देवी दधातु मे.. (३)
अर्यमा, भग और बृहस्पति देव, हमें धन प्रदान करें. इंद्राणी आदि देवियां तथा प्रिय
वाणी वाली सरस्वती देवी हमें धन प्रदान करें. (३)
सोमं राजानमवसे ऽ ग्निं गीर्भिर्हवामहे.
आदित्यं विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्.. (४)
हम तेजस्वी सोम और अग्नि को स्तुति रूपी वचनों के द्वारा यहां बुलाते हैं. वे हमारा
मनचाहा फल दे कर हमारी रक्षा करें. हम अदिति के पुत्र, मित्र और वरुण को, सब के प्रेरक
सूर्यं को तथा इन सभी देवों को बनाने वाले ब्रह्मा को तथा देवों के हितकारक बृहस्पति को
बुलाते हैं. (४)
त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं च वर्धय.
त्वं नो देव दातवे रयिं दानाय चोदय.. (५)
हे अग्नि! तुम अन्य अग्नियों के साथ मिल कर हमारी मंत्रों वाली स्तुति को और
स्तुतियों द्वारा साध्य यज्ञ को सफल करो. हे अग्नि देव! हवि देने वाले हमारे यजमान को हमें
धन देने के लिए प्रेरित करो. (५)
इन्द्रवायू उभाविह सुहवेह हवामहे.
यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद् दानकामश्च नो भुवत्.. (६)
इंद्र और अग्नि सुखपूर्वक बुलाए जा सकते हैं, इसलिए हम इस यज्ञ में उन का आह्वान
करते हैं. हम इस कारण उन का आह्वान करते हैं कि हमारे सभी जन उन की संगति से
शोभन मन वाले बनें तथा हमें दान देने की इच्छा करे. (६)
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