अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1042, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअप्रपाणा च वेशन्ता रेवां अप्रतिदिश्यः.
अयभ्या कन्या कल्याणी तोता कल्पेषु संमिता.. (८)
जो सरोवर जलपूर्ण नहीं हैं; जो धनी हैं, पर दानी नहीं हैं; जो कन्याएं गृहस्थ धर्म के
योग्य नहीं हैं, ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (८)
सुप्रपाणा च वेशन्ता रेवान्त्सुप्रतिदिश्यः.
सुयभ्या कन्या कल्याणी तोता कल्पेषु संमिता.. (९)
सरोवरों का पीने योग्य जल से भरा होना, धनी होने पर दानी होना तथा सुंदर कन्या
होने पर गृहस्थ धर्म के योग्य होना—ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (९)
परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधिंगमः.
अनाशुरश्वायामी तोता कल्पेषु संमिता.. (१०)
हे इंद्र! तुम ने दाशराज युद्ध में मनुष्यों की खोज की थी. तुम सब के लिए रूपहीन बन
गए थे. तुम उन के साथ यज्ञ के लिए कल्पित हुए. (१०)
वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधिंगमः.
श्वाशुरश्वायामी तोता कल्पेषु संमिता.. (११)
हे कामनाओं को पूरा करने वाले इंद्र! तुम सूर्य के रूप में अक्षु को झुकाते हो तथा
रोहिणी को विस्तृत मुख वाला बना देते हो. तुम ने वृत्र असुर का सिर काटा था. (११)
यदिन्द्रादो दाशराज्ञे मानुषं वि गाहथाः.
विरूपः सर्वस्मा आसीत् सह यक्षाय कल्पते.. (१२)
जिन्होंने पंख काट कर पर्वतों को स्थिर किया, जल का अवगाहन किया और वृत्र असुर
का वध किया, उन इंद्र को नमस्कार है. (१२)
त्वं वृषाक्षुं मघवन्नम्रं मर्याकरो रविः.
त्वं रौहिणं व्या स्यो वि वृत्रस्याभिनच्छिः.. (१३)
हरे रंग के घोड़ों पर बैठ कर तेज चाल से आते हुए इंद्र ने घोड़ों के विषय में उच्चैःश्रवा
से कहा, “हे अश्व! तेरा कल्याण हो. तू माला से सुशोभित इंद्र को अपनी पीठ पर चढ़ाता है.”
(१३)
यः पर्वतान् व्यदधाद् यो अपो व्यगाहथाः.
इन्द्रो यो वृत्रहान्महं तस्मादिन्द्र नमो ऽ स्तु ते.. (१४)
हे इंद्र! श्वेत अश्व तुम्हारे रथ की दाईं ओर जुड़ते हैं. उन अश्वों पर सवारी करने वाले तुम
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