अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1016, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! अश्व, गौ और अन्न की कामना करने वाले हम तुम्हारा आश्रय पाने के लिए
नवीन तथा उत्तम बुद्धि से संगत हो कर तुम्हें बुलाते हैं. (५)
मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्.
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (६)
हे रोगी पुरुष! मैं तेरे जीवन के हेतु हवि देता हुआ तुझे क्षय आदि रोगों से मुक्त करता
हूं. हे इंद्र और अग्नि! यदि इस पुरुष को पिशाची ने पकड़ लिया हो तो इसे उस के पाप से
छुड़ाओ. (६)
यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव.
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय.. (७)
यह पुरुष दुर्गति को प्राप्त हो गया है और इस की आयु क्षीण हो गई है. यह मृत्यु के
समीप पहुंच गया है, तब भी मैं इस को, निर्ऋति के अंक को खींचता हूं. मैं ने इस का स्पर्श
इस हेतु किया है कि यह सौ वर्ष की आयु प्राप्त करे. (७)
सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.
इन्द्रो यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (८)
मैं हवि के द्वारा इस रोगी पुरुष को हजारों सूक्ष्म दृष्टियों, सैकड़ों वीर्यों तथा सौ वर्ष की
आयु के लिए मृत्यु से छीन लाया हूं. इसे इंद्र पूरी आयु के लिए पाप के पार लगाएं. (८)
शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्.
शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.. (९)
हे रोगी! तू सौ वर्ष तक जीवित रहता हुआ वृद्धि प्राप्त कर. तू सौ हेमंतों तथा सौ वसंतों
तक जीवित रह. इंद्र, अग्नि, सविता तथा बृहस्पति तुझे शतायु बनाएं. इस हवि के द्वारा मैं
तुझे शतायु बना कर ले आया हूं. (९)
आहार्षमविदं त्वा पुनरागाः पुनर्णवः.
सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च ते ऽ विदम्.. (१०)
हे रोगी पुरुष! तू लौट आ तथा पुनः नव जीवन प्राप्त कर. इस कर्म के द्वारा मैं ने तुझे
दर्शन शक्ति तथा पूर्ण आयु देने में सफलता प्राप्त कर ली है. (१०)
ब्रह्मणाग्निः संविदानो रक्षोहा बाधतामितः.
अमीवा यस्ते गर्भं दुर्णामा योनिमाशये.. (११)
अग्नि देवता राक्षसों को नष्ट करने वाले मंत्र से युक्त हो कर तेरे दूषित रोग को रोक दें.