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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 1008, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 1008

बृहस्पति को शेष देव अलगअलग दिशाओं में रहते हुए भी उन्नति प्रदान करते हैं. (१०)
सत्यामाशिषं कृणुता वयोद्यै कीरिं चिद्द्यावथ स्वेभिरेवैः.
पश्चा मृधो अप भवन्तु विश्वास्तद् रोदसी शृणुतं विश्वमिन्वे.. (११)
अन्न के पोषक कारणों के आशीर्वाद को सत्य करते हुए बृहस्पति स्तुतिकर्ता के रक्षक
बनें. हे द्यावा पृथ्वी! तुम अग्नि संबंधी ऋचाओं का उच्चारण सुनो. जितने भी युद्ध हैं, वे सब
तुम्हारी कृपा से समाप्त हो जाएं. (११)
इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानमभिनदर्बुदस्य.
अहन्नहिमरिणात् सप्त सिन्धून् देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (१२)
इंद्र अपनी महिमा के द्वारा मेघ का मस्तक काट देते हैं. वे मेघ पर प्रहार कर के सात
नदियों को प्रकट करते हैं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम हमारा पोषण करने वाले बनो. (१२)
सूक्त-९२ देवता—इंद्र
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (१)
हे स्तोता! मैं गायों के स्वामी इंद्र को जिस प्रकार प्राप्त कर सकूं, तुम उसी प्रकार उन
का पूजन करो. (१)
आ हरयः ससृजिरे ऽ रुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि संनवामहे.. (२)
जिन कुशों पर हम इंद्र का पूजन कर रहे हैं, उन पर इंद्र के घोड़े उनके रथ को पहुंचाएं.
(२)
इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु. यत् सीमुपह्वरे विदत्.. (३)
जब गाएं इंद्र के लिए दूध दुहाती हैं, तब इंद्र सभी ओर से मधुर सोमरसों को प्राप्त करते
हैं. (३)
उद् यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि.
मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे.. (४)
ऊपर जो वृत्र राक्षस का हनन करने वाला स्वर्ग है, उस में हम इंद्र के साथ गमन करें.
हम इक्कीस बार मधु को पी कर इंद्र की मित्रता प्राप्त करें. (४)
अर्चत प्रार्चत प्रियमैधासो अर्चत. अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत..
(५)
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