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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 405 में से

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पृष्ठ 27

२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है, अतएव आत्मा से भिन्न सब मिथ्या है, क्योंकि कहा
गया है—
ब्रह्मभिन्नम्, सर्वं मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात् ।
ब्रह्म से भिन्न सारा जगत् ब्रह्म से पृथक् होने के कारण
शक्ति में रजत की तरह मिथ्या है, इस अनुमान-प्रमाण से
जगत् का मिथ्यात्व सिद्ध होता है । और इसी से आत्मा में
विजातीय-भेद भी नहीं है । आत्मा निश्चय है, इस वास्ते
उसमें स्व-गत भेद भी नहीं है क्योंकि स्व-गत भेद सावयव
पदार्थों में होता है । आत्मा देश, काल और वस्तु के
परिच्छेद से रहित है, क्योंकि देश, काल और वस्तु का
परिच्छेद परिच्छिन्न पदार्थ में ही रहता है, व्यापक में नहीं
रहता है ।

जो वस्तु किसी काल में हो और किसी काल में न हो,
वह वस्तु काल-परिच्छेदवाली कहलाती है, ऐसे घटपटादिक
पदार्थ ही हैं, आत्मा तो तीनों कालों में एक-सा ज्यों का त्यों
बना रहता है, इस वास्ते काल-परिच्छेद से आत्मा रहित है ।

जो वस्तु एक देश में हो और दूसरे देश में न हो, वह
देश-परिच्छेदवाली कहलाती है, ऐसे घटपटादिक पदार्थ ही
हैं, आत्मा तो सब देश में है, इस वास्ते वह देश परिच्छेद से
भी रहित है ।

जो एक वस्तु दूसरी वस्तु में न रहे, वह वस्तु परिच्छेद
कहलाता है, जैसे घट, पट में नहीं रहता है और पट, घट
में नहीं रहता है, परन्तु आत्मा सब वस्तुओं में ज्यों का त्यों
एक-रस रहता है, इस वास्ते वह वस्तु परिच्छेद से भी
रहित है ।