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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 405 में से

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पृष्ठ 16

पहला प्रकरण । ९

हैं । और पाँचों तत्त्वों का समुदाय-रूप इन्द्रियों का विषय जो
यह स्थूल शरीर है, वह भी तुम नहीं हो, क्योंकि शरीर क्षण-
क्षण में परिणाम को प्राप्त होता जाता है । जो बाल-अवस्था
का शरीर होता है, वह कुमार अवस्था में नहीं रहता है । कुमार
अवस्थावाला शरीर युवा अवस्था में नहीं रहता । युवा
अवस्थावाला शरीर वृद्ध अवस्था में नहीं रहता । और
आत्मा, सब अवस्थाओं में एक ही, ज्यों का त्यों रहता है, इसी
वास्ते युवा और वृद्धावस्था में प्रत्यभिज्ञाज्ञान भी होता है ।
अर्थात् पुरुष कहता है कि मैंने बाल्यावस्था में माता और
पिता का अनुभव किया । कुमारावस्था में खेलता रहा युवा
अवस्था में स्त्री के साथ शयन किया । अब देखिये—अवस्थाएँ
सब बदली जाती हैं, पर अवस्था का अनुभव करनेवाला आत्मा
नहीं बदलता है, किंतु एकरस ज्यों का त्यों ही रहता है ।

यदि अवस्था के साथ आत्मा भी बदलता जाता, तब
प्रत्यभिज्ञाज्ञान कदापि न होता । क्योंकि ऐसा नियम है कि जो
अनुभव का कर्ता होता है, वही स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का भी
कर्ता होता है । दूसरे के देखे हुए पदार्थों का स्मरण दूसरे
को नहीं होता है । इसी से सिद्ध होता है कि आत्मा देहा-
दिकों से भिन्न है, और देहादिकों का साक्षी भी है । जो
देहादिकों से भिन्न है, और देहादिकों का साक्षी भी है, हे
राजन् ! उसी चिद्रूप को तुम अपना आत्मा जानो ।

जैसे घरवाला पुरुष कहता है—मेरा घर है, पलँग है
और मेरा बिछौना है । और वह पुरुष घर और पलँग आदि
से जैसे जुदा है, वैसे पुरुष कहता है—यह मेरा शरीर है, ये
मेरे इन्द्रियादिक हैं । जो शरीर और इन्द्रियों का अनुभव