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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 805 में से

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पृष्ठ 735

भावार्थसंहिता ॥ ४५

ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, दर्शपूर्णमासाग्रयणेष्टिचातुर्मास्यपशु-
सोमैश्च यजेत नैयमिकं ह्येतदृणसंस्तुतं च ॥ ४१ ॥ विज्ञा-
यते हि त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् ब्राह्मणो जायते । इति ॥ ४२ ॥
यज्ञेन देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः, ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्य इत्येष
वाऽनृणो यज्वा यः पुत्री ब्रह्मचर्यवानिति ॥ ४३ ॥ गर्भाष्ट-
मेषु ब्राह्मणमुपनयीत, गर्भेकादशेषु राजन्यं, गर्भद्वादशेषु वै-
श्यम् ॥४४॥ पालाशो बैल्वो वा दण्डो ब्राह्मणस्य, नैयग्रोधः
क्षत्रियस्य वा, औदुम्बरो वा वैश्यस्य ॥४५॥ केशसंमितो ब्रा-
ह्मणस्य, ललाटसंमितः क्षत्रियस्य, घ्राणसंमितो वैश्यस्य ॥४६॥
मौञ्जी रशना ब्राह्मणस्य, धनुर्ज्या क्षत्रियस्य, शणतान्तवी वै-
श्यस्य ॥ ४७ ॥ कृष्णाजिनमुत्तरीयं ब्राह्मणस्य, रौरवं क्षत्रि-


शुनासीरीयपर्व ये चारों चातुर्मास्य, निरूढपशुयाग, और सोमयाग (अग्निष्टोम) इतने यज्ञ नियम से करे क्योंकि इन सबका करना ऋण चुकाने की प्रशंसा में परिगणित है ॥ ४१ ॥ श्रुति में लिखा है कि "द्विजत्व के संस्कार को प्राप्त हुआ ब्राह्मण तीन प्रकार के ऋणों से ऋणी हो जाता है,, ॥ ४२ ॥ यज्ञों के द्वारा देवों का, पुत्रोत्पत्ति द्वारा पितरों का, और ब्रह्मचर्याश्रम के नियम धर्म पालन द्वारा पितरों का ऋण चुकावे, यज्ञों का करनेवाला, पुत्रोंवाला और ब्रह्मचर्याश्रम युक्त होने पर तीनों ऋणों से मुक्त हुआ मोक्ष का पूर्णाधिकारी हो जाता है ॥ ४३ ॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का, गर्भ से ग्यारहवें वर्ष क्षत्रिय का, और गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य के बालक का उपनयन संस्कार करे ॥ ४४ ॥ पलाश (ढांक) का वा विल्व का दण्ड ब्राह्मण ब्रह्मचारी का, (वट बरगद) का क्षत्रिय ब्रह्मचारी का और गूलर का दण्ड वैश्य ब्रह्मचारी का होवे ॥ ४५ ॥ चोटी की बराबर ऊंचा ब्राह्मण का, मस्तक तक क्षत्रिय का और नासिका के मूल तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड रखना चाहिये ॥ ४६ ॥ मूंज की मेखला (कन्धनी) ब्राह्मण की, धनुर्ज्या क्षत्रिय की और शण की मेखला वैश्य ब्रह्मचारी के लिये होवे ॥४७॥ काला (कर्णायल) मृगचर्म ब्राह्मण को, रुरु (रोज) मृग का क्षत्रिय को और बैल वा बकरेका चर्म वैश्य ब्रह्मचारी को दुपट्टा के स्थान