अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ भाषार्थसहिता ॥ ३५
फलहरितधान्यशाकादाने पञ्चकृष्णलमल्पे पशुपीड़िते स्वा-
मिदोषः पालसंयुक्ते तु तस्मिन् पथि क्षेत्रेऽनावृते पालक्षेत्रि
कयोः पञ्च माषा गवि षडुष्ट्रे खरेऽश्वमहिष्योर्दशाजाविषु
द्वौ द्वौ सर्वविनाशे शतं, शिष्टाकरणे प्रतिषिद्धसेवायां च नि-
त्यं चेलपिण्डादूर्ध्वं स्वहरणङ्गवाऽन्यर्थे तृणमेधान्वीरुद्वन-
स्पतीनां च पुष्पाणि स्ववदाददीत, फलानि चापरिवृता-
नां कुसीदवृद्धिर्धर्म्या विंशतिः पञ्च माषकी मासं नातिसांव-
त्सरीमेके चिरस्थाने द्वैगुण्यं प्रयोगस्य मुक्ताभिर्न वर्द्धते दि-
त्सतोऽवरुद्धस्य च चक्रकालवृद्धिः कारिताकायिकाऽधिभो-
ना चाहिये । अर्थात शूद्र से अधिक वैश्य को और सब से अधिक दंड ब्राह्म-
ण को हो । फल, हरा धान्य और शाकों के चुराने पर चार रत्ती सुवर्ण का
दंड (जुर्माना) करे । पशुओं के द्वारा खेत की थोड़ी हानि हो तो पशु के
मालिक का दोष होगा । यदि चरवाहा (ग्वालिया) साथ में हो तो ग्वा-
लिया का दोष होगा । यदि मार्ग के पास २ खेत हो और खेत का बाड़ा न
खिंचा हो तो खेत के मालिक और ग्वालिया दोनों का अपराध माना जा-
यगा । यदि गौ वा बैल ने खेत को उजाड़ा हो तो पांच मासे, ऊंट से उज-
ड़ा हो तो छः मासे, गधा, घोड़ा, और भैंसी ने खेत उजाड़ा हो तो दश २
मासे और भेड़ बकरियों ने खेत चर लिया हो तो दो दो मासे सुवर्ण का
दंड (जुर्माना) पशु के मालिक पर होना चाहिये । यदि सब खेत बिलकुल
खा लिया हो तो सौ १०० मासे सुवर्ण का राजा दंड देवे । यदि ब्राह्मणादि
अपना २ शास्त्रोक्त कर्म न करें और निषिद्ध हिंसा चोरी आदि कर्म करें तो
निर्वाहमात्र भोजन वस्त्र छोड़के उनका शेष धनादि हरलेना चाहिये । गौ और
अग्नि की रक्षा के लिये घास, ईंधन, लता, और वनस्पतियों की फल पत्ती
अपने पदार्थ के तुल्य ले आवे उस में अपराध वा चोरी नहीं है । जिस बाग
बगीचे का बाड़ा न खिंचा हो उन वृक्षों के फल तोड़ लाने में भी दोष नहीं
है । मूलका बीशवां हिस्सा सूद लेना धर्मानुकूल है (इस में प्रति मासं १)
सैकड़ा सूद पड़ेगा) महिने २ सूद लेतो पांच मासे सुवर्ण सैकड़ा पर लेवे ।
अधिक नहीं । कोई आचार्य कहते हैं कि वार्षिक सूद नियत करके लिया करे।
यदि ऋणी पर बहुत काल तक सूद सहित धन रहे तो जितना मूल धन दिया
हो उस से द्विगुण तक सब लेवे अधिक नहीं । वृद्धियों के देते जाने पर धन
का कर्जा नहीं बढ़ता है । यदि नियत सूद न चुकाता जाय किन्तु रोके