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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 805 में से

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पृष्ठ 594

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गौतमस्मृतिः ॥

त्येते चत्वारिंशत्संस्काराः ॥ ३ ॥ अथाष्टावात्मगुणा दंया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासो मङ्गलमकार्प-
ण्यमस्पृहेति यस्यैते न चत्वारिंशत्संस्कारा नवाष्टावात्मगु-
णा न स ब्रह्मणः सालोक्यं सायुज्यं च गच्छति ॥ ४ ॥ यस्य
तु खलु संस्काराणामेकदेशोऽप्यष्टावात्मगुणा अथ स ब्रह्म-
णः सालोक्यं सायुज्यं च गच्छति गच्छति ॥ ५ ॥

इति गौतमोये धर्मशास्त्रेऽष्टमोध्यायः ॥ ८ ॥

स विधिपूर्वं स्नात्वा भार्यामधिगम्य यथोक्तान् गृह-
स्थधर्मान् प्रयुञ्जान इमानि व्रतान्यनुकर्षेत् स्नातको नित्यं
शुचिः सुगन्धः स्नानशीलः सति विभवे न जीर्णमलवद्वासाः


सोमयाग कहाते हैं । ये चालीस संस्कार हैं ॥ ३ ॥ अब आत्मा नाम अन्तःक-
रण ( मन ) के आठ गुण ( धर्म ) ये हैं कि-१-सब प्राणियों पर दया करना
२-असमर्थ दीन दुःखियों वा अपने आधीन स्त्री पुत्रादि के अनुचित बर्ताव
को सह लेना । ३—किसी की निन्दा न करना । ४- बाहरी भीतरी शुद्धि
करना । ५-परोपकारादि के परिश्रम में कष्ट न मानना । ६-मङ्गल मानना
( शोकादि का त्याग ) ७-उदारता रखना । ८-तृष्णा को त्याग कर स-
न्तोष धारण करना । जिस पुरुष के ये चालीस संस्कार न हुये हों और आ-
ठो आत्मगुण भी जिस में न हों वह ब्रह्म ( परमात्मा ) के साथ सालोक्य
वा सायुज्य मुक्ति को प्राप्त नहीं होता ॥ ४ ॥ और जिस के चालीस संस्कारों
में से थोड़े भी संस्कार यथावत् हुये हों और दयादि आठो धर्म जिस में वि-
द्यमान हों वह भी मोक्ष को अवश्य प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

अब स्नातक ( गृहस्थ ) पुरुष के नियम धर्म कहते हैं । पहिले गृह्यसूत्रों
में लिखे विधान के अनुसार समावर्त्तन ( संस्कार ) स्नान कर के पश्चात् वि-
धि पूर्वक विवाह करके ठीक शास्त्रोक्त गृहस्थ के धर्मों का पालन करता हुआ
उन आगे कहे नियमों को ठीक २ धारण करे । स्नातक पुरुष ( वा गृहस्थ-
मात्र ) नित्य ही शुद्ध रहे, सुगन्ध ( चन्दन केशर इतर आदि ) लगावे,
नियम से स्नान करे, सम्पत्ति होने पर फटे वा मलिन वस्त्र कदापि धारण