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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 805 में से

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पृष्ठ 555

भाषार्थसहिता ॥ १९

सहस्रगुणमाचार्ये त्वनन्तंवेदपारगे ॥ २८ ॥
विधिहीनेयथाऽपात्रे योददातिप्रतिग्रहम् ।
न केवलंहितद्व्यर्थं शेषमप्यस्यनश्यति ॥ २९ ॥
व्यसनप्रतिकारार्थे कुटुम्बार्थेचयाचते ।
एवमन्विष्यदातव्यं सर्वदानेष्वयंविधिः ॥ ३० ॥
मातापितृविहीनस्य संस्कारोद्वाहनादिभिः ।
यःस्थापयतितस्येह पुण्यसंख्यानविद्यते ॥ ३१ ॥
यच्छ्रेयोनाग्निहोत्रेण नाग्निष्टोमेन लभ्यते ।
तच्छ्रेयःप्राप्नुयाद्विप्रो विप्रेणस्थापितेनवै ॥ ३२ ॥
यद्यदिष्टतमंलोके यच्चात्मदयितंभवेत् ।
तत्तद्गुणवतेदेयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥ ३३ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


आचार्य को दान देने से सहस्र गुणा और फल होता और वेदपार गन्ता ( जिस ने वेद का ठीक २ मर्म जान लिया हो ) को दान देने से अनन्त फल होता है ॥ २८ ॥ विधि से-हीन तथा कुपात्र को जो प्रतिग्रह (दान) देता है । वह दान केवल व्यर्थ ही नहीं है किन्तु उस का शेष धन भी नष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मणादि अपनी दुःख विपत्ति को हटाने के लिये वा कुटुम्ब का पालन पोषण करने मात्र के लिये याचना करता हो उस को खोज कर देना चाहिये, यह सब दानों में उत्तम विधि है ॥३०॥ जिस के माता पिता मर गये हों, ऐसे अनाथ बालक की उपनयनादि संस्कार और विवाह आदि कर के जो मनुष्य स्थिति करता है उस के पुण्य की संख्या नहीं है ॥३१॥ जो कल्याण अग्निहोत्र और अग्निष्टोम यज्ञ से प्राप्त नहीं होता । उस कल्याण को वह ब्राह्मण प्राप्त होता है जो अनाथ ब्राह्मण बालक की नींव-स्थापित कर देता है ॥ ३२ ॥ संसार में जो २ वस्तु अत्यन्त इष्ट और जो वस्तु अपने को प्रिय हो वह २ पदार्थ सुपात्र गुणी विद्वान् को देना चाहिये ऐसे दान से अक्षय सुख मिलता है ॥ ३३ ॥

यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥

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